श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.1.42 
নিরবধি কৃষ্ণাবেশ প্রভুর শরীরে
মহা-বিরক্তের প্রায ব্যবহার করে
निरवधि कृष्णावेश प्रभुर शरीरे
महा-विरक्तेर प्राय व्यवहार करे
 
 
अनुवाद
भगवान के शरीर में कृष्ण का परमानंद प्रेम निरन्तर दृष्टिगोचर होता था और वे अपने व्यवहार में अत्यन्त त्यागी हो जाते थे।
 
The ecstatic love of Krishna was constantly visible in the body of the Lord and he became extremely renunciant in his behavior.
तात्पर्य
कृष्ण के प्रति अधिरूढ़-महाभाव रूपी प्रेम सदैव प्रभु के शरीर में स्थित था। अतः, श्रेष्ठतम त्यागी के पदचिन्हों पर चलते हुए और एक भक्त के भाव में लीन होकर, उन्होंने व्यक्तिगत सुख भोगने की समस्त इच्छाओं का त्याग किया और शुद्ध त्याग के अवतार के रूप में एक मनमोहक तामल-वृक्ष-कृष्णवर्ण व्यक्तित्व के प्रति आकर्षित होने की तीव्र उत्सुकता प्रदर्शित की। ज्ञान, त्याग और भक्ति की एक साथ उपस्थिति के संबंध में, श्रीमद् भागवतम (11.2.42) के निम्नलिखित श्लोक पर चर्चा की जानी चाहिए:

भक्तिः परेशानुभवो विरक्ति-

रन्यत्र चैष त्रिक एक-कालः

प्रपद्यमानस्य यथाऽश्रतः स्यु-

स्तुष्टिः पुष्टिः क्षुद-अपायोऽनु-घासम्

"भक्ति, परम भगवान का प्रत्यक्ष अनुभव, और अन्य वस्तुओं से वैराग्य – ये तीनों एक साथ उस व्यक्ति के लिए घटित होते हैं जिसने परम भगवान का आश्रय लिया हो, उसी प्रकार जिस प्रकार एक व्यक्ति के लिए आनंद, पोषण और भूख से मुक्ति एक साथ घटित और बढ़ती रहती है, प्रत्येक ग्रास के साथ जो भोजन करने में संलग्न होता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)