श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 414-418
 
 
श्लोक  2.1.414-418 
প্রভুর আবেশে দেখি’ সর্ব-ভক্ত-গণ
পরম-অপূর্ব সবে ভাবে মনে-মন
পরম-সন্তোষ সবে হৈলা অন্তরে
“এবে সে কীর্তন হৈল নদীযা-নগরে
এমন দুর্লভ ভক্তি আছযে জগতে?
নযন সফল হয এ ভক্তি দেখিতে!
যত ঔদ্ধত্যের সীমাএই বিশ্বম্ভর
প্রেম দেখিলাঙ নারদাদিরো দুষ্কর
হেন উদ্ধতের যদি হেন ভক্তি হয
না বুঝি কৃষ্ণের ইচ্ছা,—এ বা কিবা হয”
प्रभुर आवेशे देखि’ सर्व-भक्त-गण
परम-अपूर्व सबे भावे मने-मन
परम-सन्तोष सबे हैला अन्तरे
“एबे से कीर्तन हैल नदीया-नगरे
एमन दुर्लभ भक्ति आछये जगते?
नयन सफल हय ए भक्ति देखिते!
यत औद्धत्येर सीमाएइ विश्वम्भर
प्रेम देखिलाङ नारदादिरो दुष्कर
हेन उद्धतेर यदि हेन भक्ति हय
ना बुझि कृष्णेर इच्छा,—ए वा किबा हय”
 
 
अनुवाद
जब भक्तों ने भगवान को आनंद से अभिभूत देखा, तो उन्हें लगा कि उन्होंने कभी भी ऐसा अद्भुत अनुभव नहीं किया था। वे हृदय से पूर्णतः संतुष्ट हो गए और सोचने लगे, "अब नादिया नगरी में कीर्तन का शुभारंभ हो गया है। क्या संसार में ऐसी दुर्लभ भक्ति है? ऐसी भक्ति के दर्शन से ही नेत्रों का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है। ये विश्वम्भर अहंकार की पराकाष्ठा थे, फिर भी अब हमने उनमें ऐसा भगवद्प्रेम देखा है जो नारद जैसे व्यक्तियों के लिए भी दुर्लभ है। यदि ऐसा अभिमानी व्यक्ति ऐसी भक्ति प्राप्त कर सकता है, तो हम कृष्ण की इच्छा या यह व्यक्ति क्या बनेगा, यह नहीं समझ सकते।
 
When the devotees saw the Lord overwhelmed with joy, they felt as if they had never experienced such a wonderful experience. They were completely satisfied in their hearts and thought, "Now the kirtan has begun in the city of Nadia. Is there such rare devotion in the world? The mere sight of such devotion fulfills the purpose of the eyes. This Vishvambhara was the pinnacle of ego, yet now we have seen in him a love for God that is rare even for people like Narada. If such an arrogant person can attain such devotion, we cannot understand Krishna's will or what this person will become."
तात्पर्य
पद्य 417 में, शब्द 'सीमा' का अर्थ है "अंतिम" या "सर्वोच्च", और शब्द 'दुष्कर' का अर्थ है "दुर्लभ", "प्राप्त करना कठिन", या "असामान्य"।

त्रिदंडी गोस्वामी श्रीपाद प्रबोधानंद सरस्वती ने अपने श्री चैतन्य-चंद्रामृत (111-121, 124, 126-128, 133, 134) में गौर के अवतार और कीर्तन की महिमा का विस्तृत वर्णन किया है, जैसा कि निम्नलिखित है:

"जब सबसे दयालु श्री चैतन्यदेव अचानक इस दुनिया में प्रकट हुए, तो अब योग, ध्यान, मंत्रों का जाप, तपस्या, त्याग, सख्त व्रत का पालन, वेदों का अध्ययन या व्यवहार के सख्त सिद्धांतों की आवश्यकता नहीं रह गई। इनके बारे में बोलने की तो बात ही क्या, यहां तक कि जो लोग अपनी पापपूर्ण गतिविधियों को त्यागने के लिए अनिच्छुक थे, वे खुशी-खुशी सबसे ऊंचे प्यार को लूट ले गए, जो जीवन के सभी लक्ष्यों का शीर्ष गहना है।

"जब इस दुनिया में सबसे अद्भुत और भव्य श्री चैतन्यदेव प्रकट हुए, तो यहां तक कि फलदायी कर्मियों के दिमाग, जो दुर्जेय फलदायी गतिविधियों की धाराओं में विलीन हो गए थे, भगवान के प्रेम को प्राप्त करके शांत हो गए और हालांकि ऐसे दिमाग सबसे कठोर पत्थर से भी कठोर थे, वे भक्ति सेवा के दिव्य भावों से पिघल गए। यहां तक कि तीव्र योगाभ्यास करने वाले व्यक्तियों के दिल भी ऐसे अस्थायी अभ्यास से सेवानिवृत्त हो गए और नाचने लगे। दूसरे शब्दों में, उन्होंने अधोक्षज के आध्यात्मिक राज्य में भगवान के प्रेम का आनंद लिया।

"अब जब भगवान चैतन्यचंद्र ने शुद्ध भक्ति सेवा का मार्ग प्रकट किया है, तो भौतिकवादियों ने अपनी पत्नियों, बच्चों और भौतिक मामलों के बारे में बात करना छोड़ दिया है; विद्वानों ने शास्त्रों पर बहस करना छोड़ दिया है; योगियों ने अपनी सांस को नियंत्रित करने की परेशानी छोड़ दी है; तपस्वियों ने अपनी तपस्या छोड़ दी है; और निराकारवादियों ने वेदांत का अध्ययन करना छोड़ दिया है। कृष्ण के प्रति भक्ति सेवा के मधुर स्वाद के अलावा किसी और चीज से कोई आकर्षित नहीं है।

"हर घर में हरि-संगीर्तन का कोलाहल है। हर किसी के शरीर में आनंद के लक्षण दिखाई देते हैं जैसे आंसू बहाना और रोंगटे खड़े होना। हर दिल में सबसे ऊंचा और मधुर आध्यात्मिक मार्ग है जो चारों वेदों के मार्ग से बहुत दूर जाता है। यह सब अब प्रकट हुआ है जब भगवान गौर इस दुनिया में उतरे हैं।

"जब सबसे आकर्षक और मोहक भगवान श्री कृष्ण इस दुनिया में सुनहरे रंग के साथ प्रकट हुए, तो पूरी दुनिया अचानक कृष्ण के लिए शुद्ध प्रेम के अमृत सागर से भर गई और आनंद के असाधारण परिवर्तनों को देखकर जो पहले कभी न देखे या सुने नहीं गए थे, वे आश्चर्यचकित हो गए।

"अतीत में कई विद्वान अत्यधिक घमंडी हो गए, खुद को सभी शास्त्रों के सर्वज्ञ मास्टर मानते थे, और कई अन्य लोगों ने सोचा कि वे कठोर तपस्या या स्मृतियों में वर्णित संवैधानिक और सशर्त कर्तव्यों के पालन के माध्यम से पूर्ण हो गए हैं। सांख्य-योग के प्रारंभिक या उन्नत चरणों पर स्थित कुछ व्यक्ति भगवान हरि के पवित्र नामों का दो या तीन बार जाप करते थे। फिर भी ऐसे सभी व्यक्तियों के दिल धोखा देने की प्रवृत्ति से भरे हुए थे। वह अतीत में था। लेकिन अब जब भगवान गौरचंद्र प्रकट हुए हैं, भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम आम हो गया है। दूसरे शब्दों में, यह सबसे अधिक पापी सहित सभी के लिए उपलब्ध हो गया है।

"अब भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, श्री चैतन्यदेव, जो दिव्य लीलाओं का आनंद लेने वाले हैं और जिनके चरण कमलों की सेवा के लिए देवता आकांक्षी रहते हैं, इस दुनिया में उतरे हैं और कृष्ण के लिए शुद्ध प्रेम की मधुर अमृत लहरों से इसे पूरी तरह से भर दिया है। अब कौन बच्चा है? कौन बूढ़ा है? कौन मूर्ख है? कौन स्त्री है? कौन गिरा है, और कौन दुर्भाग्यशाली है? इस दुनिया का हर कोई अब भक्ति सेवा प्राप्त करने के लिए योग्य है, और श्री हरि के चरण कमलों के लिए प्रेम के अद्भुत अमिश्र भाव उनके दिलों में प्रकट हुए हैं।

"अब जबकि भगवान गौरांग चंद्र, जो कि ईश्वर के प्रेम रस का आनंद लेने वालों की शिखर मणि हैं, इस धरती पर उतरे, तो शिव और नारद जैसे देवता (जैसे अद्वैत और श्रीवास द्वारा निर्देशित भक्त) उनके साथ प्रकट हुए। देवी लक्ष्मी देवी, स्वयं ही (जैसे श्री लक्ष्मी प्रिया और श्री विष्णु प्रिया) भी उनके साथ प्रकट हुई। भगवान बलराम, जो स्वयं-भगवान से भिन्न नहीं हैं और भगवान का पूर्ण अवतार हैं (जैसे नित्यानंद प्रभु, जिन्होंने नास्तिकों को नष्ट किया), भी उपस्थित थे। यादव (शाची और जगन्नाथ) भी प्रकट हुए। मैं और क्या कह सकता हूँ? नंद महाराज द्वारा निर्देशित व्रजवासी, सुबल द्वारा निर्देशित गोप चरवाहे, गोपियों द्वारा निर्देशित भगवान की शक्तियाँ, रक्तक और चित्रक द्वारा निर्देशित भगवान के सेवक-दूसरे शब्दों में, कृष्ण की लीलाओं के सभी अनंत काल तक पूर्ण साथी, गौरा की लीलाओं में प्रकट हुए।

"अब जब कि सुनहरे रंग के भगवान इस दुनिया में कृष्ण के शुद्ध असाधारण प्रेम का वितरण कर रहे हैं, उनके सेवक, मित्र और अनंत काल तक पूर्ण दासी जो वैभव की कल्पनाओं से रहित माधुर्य-रस में स्थित हैं, वे सभी कृष्ण के लिए शुद्ध प्रेम की अमूल्य संपत्ति का आनंद लेने के लिए उनके चरण कमलों में आए हैं, जो कि किसी भी चीज से पहले (कृष्ण की लीलाओं में) उनका सम्मान अधिक स्वादिष्ट है |

"जब इस दुनिया में सबसे महान और असाधारण श्री चैतन्य प्रकट हुए, तो विवाहित महिलाएं जोर-जोर से हंसी (कृष्ण के प्रेम के कारण अपनी शर्म को छोड़ देने के बाद), भौतिकवादी लोगों के पत्थर के दिल जो इंद्रिय संतुष्टि से जुड़े थे, पूरी तरह से पिघल गए, और आध्यात्मिक ज्ञान से रहित लोगों ने विद्वान विद्वानों के समाज का उपहास किया (श्री चैतन्य की दया के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के बाद, दूसरे शब्दों में, उन्होंने तथाकथित विद्वानों के धर्मग्रंथ ज्ञान का उपहास किया जो विशेषज्ञ विद्वान होने का दावा करते थे)।

"इस दुनिया में श्री चैतन्य के आने से पहले, विद्वानों की संवैधानिक प्रवृत्तियाँ, जो कृष्ण की सेवा के रूप में थी, सभी धर्मग्रंथों को जानने के गर्व के साथ व्यावहारिक रूप से ढकी हुई थी। उन्होंने कृष्ण के प्रेम को प्राप्त करने का प्रयास नहीं किया, जो कि जीवन के उद्देश्यों में सर्वोपरि रत्न है, क्योंकि उनकी बुद्धि साधारण और अनिश्चित थी। लेकिन जब से गौरांग चंद्र इस दुनिया में दयालुता से प्रकट हुए हैं, जो सबसे अधिक अपूरणीय और अद्भुत प्रेमपूर्ण भक्ति सेवा में विलय नहीं हुआ है जो कि वैवाहिक प्रेम के सबसे ऊंचे उज्ज्वल मेल से भरा है और विभावा और अनुभावा जैसी सामग्रियों द्वारा पोषित है?

"हालाँकि महान सर्वज्ञ ऋषियों ने तर्क और तर्क के आधार पर अपने संबंधित सिद्धांत स्थापित किए, लेकिन कोई भी उनके पूर्वाग्रही दर्शन से दृढ़ता से आश्वस्त नहीं था। लेकिन जब से श्री गौरांग चंद्र, जिनकी महिमा अटूट है, इस दुनिया में प्रकट हुए हैं, किसने यह आत्मविश्वास से स्वीकार नहीं किया है कि हरि की भक्ति सेवा ही आध्यात्मिक गतिविधि और वेदों का उद्देश्य है?

"कुछ लोग कुछ सबसे पवित्र प्राचीन महान हस्तियों के समर्थन से वैकुण्ठ के निवास को प्राप्त करने में सफल हो गए हैं, लेकिन किसी ने भी पहले कभी श्री चैतन्य चंद्र की तरह पूरी दुनिया को ईश्वर के प्रेम के सागर में डुबोया नहीं है।

"धार्मिकता के लिए अतुलनीय लगाव बनाए रखने और शुद्ध भक्ति सेवा की उचित शरण लेने के बाद भी लोग इस दुनिया में लोहे की तरह सख्त दिल से रहते हैं; लेकिन कितना अद्भुत (श्री गौराहारि की दया के माध्यम से), पापी व्यक्ति जो गाय-हत्यारों से भी नीच हैं (पापी प्रवृत्तियों से पूरी तरह मुक्त होने के बाद) ने अपनी बहती आँसुओं के प्रेम से पूरी दुनिया में बाढ़ ला दी है।

"कितना अद्भुत! सुनहरे रंग के श्री गौरंग-सुंदर की अतुलनीय लीलाओं को कौन समझ सकता है? उन्होंने अपनी अथाह महिमा से पूरी दुनिया को चकित कर दिया है। कृष्ण के मूड में लीन, कभी-कभी वह बाल कृष्ण की तरह रेंगता था, कभी-कभी वह चरवाहे लड़कों की विशेषताओं को प्रकट करता था, कभी-कभी वह नृत्य करते हुए विभिन्न इशारे करता था, और कभी-कभी वह राधा रानी के मूड में 'हरि! हरि! हरि!' का जाप करते हुए अलगाव में दयनीय रूप से रोता था।

“जब श्री गौरसुंदर अपने आप से मोहित हो गए और दुनिया में नाचने- कूदने लगे, तब देवता डमरू बजाते, प्रमुख गँधर्व सामूहिक रूप से भगवान के नाम जपते और सिद्ध निरंतर फूल बरसाते जिसे सारी धरती ढँक लेती थी। उस समय महान ऋषि जो चुनिंदा छंदों के पाठ में दक्ष थे, प्रेम से उन्हें अपनी प्रार्थना अर्पित करते थे।

“महाभाव के अमृत मधुर भावों में लीन होकर, श्री गौरहरि कभी हँसते थे, कभी रोते थे, कभी बेहोश हो जाते थे, कभी ज़मीन पर लोटते थे, कभी तेजी से चलते थे, कभी गहरी साँस लेते थे, और कभी ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते थे, 'हा! हा!' इस तरह उन्होंने इस दुनिया में अपने शगल का आनंद लिया। ”

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)