अपने नाम के मधुर रस में मग्न होकर भगवान उसके प्रबल प्रभाव के कारण धूल में लोटने लगे।
Immersed in the sweet essence of his name, the Lord began to roll in the dust due to its strong effect.
तात्पर्य
इस श्लोक में 'निज-नाम-रसे' पद इस बात का संकेत करता है कि जो कीर्तन में व्यस्त है, वह स्वयं ही कीर्तन का मुख्य लक्ष्य है। भगवान के पवित्र नाम और भगवान स्वयं ही अभिन्न हैं, और गौर और कृष्ण भी अभिन्न हैं। इसलिए जब महाप्रभु अपनी स्वयं की महिमा का गुणगान करते हैं, तो गोलोक के स्वामी कृष्ण का माधुर्य-रस और वैकुंठ के स्वामी नारायण का ऐश्वर्य-रस प्रकट होते हैं। महाप्रभु ने पवित्र नामों के इन अलौकिक रसों का आनंद लेकर और कृष्ण के अधीनस्थ माया में तल्लीनता को त्याग कर कृष्ण में तल्लीन होने का आनंद लिया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥