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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश
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श्लोक 400
श्लोक
2.1.400
তথাপিহ এই কৃপা কর’ মহাশয!
সে বিদ্যা-বিলাস মোর রহুক হৃদয
तथापिह एइ कृपा कर’ महाशय!
से विद्या-विलास मोर रहुक हृदय
अनुवाद
फिर भी, हे प्रभु, मुझ पर यह कृपा कर दो! आपकी विद्वत्तापूर्ण लीलाएँ सदैव मेरे हृदय में बनी रहें।
Nevertheless, O Lord, please grant me this favor! May your learned pastimes always remain in my heart.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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