**महान-धीर शब्द की व्याख्या निम्न प्रकार से की गई है:** गौरासुंदर ने तर्क-वितर्क के मार्ग का अनुसरण नहीं किया; बल्कि, उन्होंने वेदों के मार्ग को पुनर्स्थापित किया। उन्होंने एक साधारण कर्मी की तरह इंद्रिय-तृप्ति पर आधारित मानसिक अनुमान की अशांति का प्रचार या प्रदर्शन नहीं किया; दूसरे शब्दों में, उन्होंने किसी को अस्थायी, सांसारिक, नाशवान सुख प्राप्त करने का निर्देश नहीं दिया। अपनी जिह्वा, पेट और जननांगों की इच्छाओं पर विजय प्राप्त करना ही धृति कहलाता है, या आत्म-संयम, या त्रिदंड-संन्यास की स्वीकृति कहलाता है। ऐसे आत्म-संयम से रहित अशांत व्यक्ति—शरीर, मन और वाणी की इच्छाओं को नियंत्रित करने के रूप में—हरी की भक्ति सेवा के पारलौकिक विषयों के बारे में कुछ भी समझ नहीं सकते। इस प्रकार वे अपने लौकिक ज्ञान की सहायता से विभिन्न प्रकार के झूठे तर्कों को आमंत्रित करते हैं। चूंकि गौरासुंदर ने ऐसे झूठे तर्कों को प्रोत्साहित नहीं किया, वे अत्यंत संयमी हैं और संयमी संन्यासियों द्वारा पूज्य हैं। यद्यपि आसक्त गृहस्थ तथा अनैतिक गौर-नागरियाँ निर्लज्जतापूर्वक यह मानते हैं कि गौरासुंदर एक अनियंत्रित आसक्त गृहस्थ थे जो संभोग संबंधों में लिप्त थे, वे उनके काल्पनिक विचारों से बहुत आगे हैं और इसलिए उन्हें महान-धीर कहा जाता है।
**संकीर्तन-मय शब्द की व्याख्या निम्न प्रकार से की गई है:** यद्यपि गौरासुंदर स्वयं परमेश्वर कृष्ण हैं, वे कृष्ण के पवित्र नामों का उच्चारण करने के व्यक्तित्व हैं, और उन्होंने एक महा-भागवत की भूमिका में अपने गौर लीलाओं का प्रकटीकरण किया है। वे परम ब्रह्म हैं और पवित्र नामों के उच्चारण के यज्ञ में पूज्य ध्वनि के व्यक्तित्व हैं।
