श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.1.4 
গৌরচন্দ্র জয ধর্ম-সেতু মহা-ধীর
জয সঙ্কীর্তন-ময সুন্দর-শরীর
गौरचन्द्र जय धर्म-सेतु महा-धीर
जय सङ्कीर्तन-मय सुन्दर-शरीर
 
 
अनुवाद
परम संयमी गौरचन्द्र की जय हो, जो धर्म के सेतु हैं! उनके परम आकर्षक रूप की जय हो, जो पवित्र नामों के सामूहिक जप का साकार रूप है!
 
Hail to Gaurachandra, the supremely restrained one, who is the bridge of dharma! Hail to his most attractive form, the embodiment of the collective chanting of the holy names!
तात्पर्य
**धर्म-सेतु शब्द की व्याख्या निम्न प्रकार से की गई है:** सांसारिक या धर्मनिरपेक्ष कर्तव्यों तथा त्यागमय या आध्यात्मिक कर्तव्यों में बहुत बड़ा अंतर होता है। इसलिए ही भगवान गौरासुंदर ने सर्वोच्च जगद्गुरु का पद ग्रहण किया तथा सांसारिक धर्मनिष्ठ लोगों के वैकुंठ में प्रवेश करने हेतु सेतु बना। हम पाते हैं कि गौरासुंदर *अचिंत्य-भेदाभेद* दर्शन के मौलिक प्रतिपादक थे, जो निराकारवादियों तथा वैष्णवों के मतभेदों को समन्वित करता है। गौराहरी ने धार्मिकता के राज्य में प्रवेश करने के लिए ऐसा कोई भी उपाय प्रस्तुत नहीं किया है जो अनैतिक, काल्पनिक, या किसी के संवैधानिक कर्तव्यों के विरुद्ध में हो। प्रकृत-सहजिया दर्शन, जो धर्म के नाम पर अनैतिकता तथा भौतिक सुख-सुविधाओं की मुक्त भोग-लिप्सा पर आधारित है, सांसारिक या लौकिक है; दूसरे शब्दों में, वे दोनों ही भौतिकवादी बाह्य ज्ञान पर आधारित हैं। सनातन-धर्म के रक्षक, भगवान गौराहरी ने हर किसी को सांसारिक विचारों का अतिक्रमण करके हरी के पवित्र नामों के सामूहिक उच्चारण का प्रचार करने के रूप में एक सेतु का निर्माण करके अक्षोभज की सेवा प्राप्त करना सिखाया।

**महान-धीर शब्द की व्याख्या निम्न प्रकार से की गई है:** गौरासुंदर ने तर्क-वितर्क के मार्ग का अनुसरण नहीं किया; बल्कि, उन्होंने वेदों के मार्ग को पुनर्स्थापित किया। उन्होंने एक साधारण कर्मी की तरह इंद्रिय-तृप्ति पर आधारित मानसिक अनुमान की अशांति का प्रचार या प्रदर्शन नहीं किया; दूसरे शब्दों में, उन्होंने किसी को अस्थायी, सांसारिक, नाशवान सुख प्राप्त करने का निर्देश नहीं दिया। अपनी जिह्वा, पेट और जननांगों की इच्छाओं पर विजय प्राप्त करना ही धृति कहलाता है, या आत्म-संयम, या त्रिदंड-संन्यास की स्वीकृति कहलाता है। ऐसे आत्म-संयम से रहित अशांत व्यक्ति—शरीर, मन और वाणी की इच्छाओं को नियंत्रित करने के रूप में—हरी की भक्ति सेवा के पारलौकिक विषयों के बारे में कुछ भी समझ नहीं सकते। इस प्रकार वे अपने लौकिक ज्ञान की सहायता से विभिन्न प्रकार के झूठे तर्कों को आमंत्रित करते हैं। चूंकि गौरासुंदर ने ऐसे झूठे तर्कों को प्रोत्साहित नहीं किया, वे अत्यंत संयमी हैं और संयमी संन्यासियों द्वारा पूज्य हैं। यद्यपि आसक्त गृहस्थ तथा अनैतिक गौर-नागरियाँ निर्लज्जतापूर्वक यह मानते हैं कि गौरासुंदर एक अनियंत्रित आसक्त गृहस्थ थे जो संभोग संबंधों में लिप्त थे, वे उनके काल्पनिक विचारों से बहुत आगे हैं और इसलिए उन्हें महान-धीर कहा जाता है।

**संकीर्तन-मय शब्द की व्याख्या निम्न प्रकार से की गई है:** यद्यपि गौरासुंदर स्वयं परमेश्वर कृष्ण हैं, वे कृष्ण के पवित्र नामों का उच्चारण करने के व्यक्तित्व हैं, और उन्होंने एक महा-भागवत की भूमिका में अपने गौर लीलाओं का प्रकटीकरण किया है। वे परम ब्रह्म हैं और पवित्र नामों के उच्चारण के यज्ञ में पूज्य ध्वनि के व्यक्तित्व हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)