श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 354
 
 
श्लोक  2.1.354 
ভক্তির শ্রবণে যে তোমার আসি’ হযে
তাহাতে তোমারে কভু নর-জ্ঞান নহে”
भक्तिर श्रवणे ये तोमार आसि’ हये
ताहाते तोमारे कभु नर-ज्ञान नहे”
 
 
अनुवाद
भक्ति के विषय में सुनते समय आपमें जो परिवर्तन आते हैं, उसके कारण कोई भी आपको कभी भी साधारण मनुष्य नहीं मान सकता।
 
Because of the changes that occur in you when you hear about devotion, no one can ever consider you an ordinary human being.
तात्पर्य
छंद की पहली लाइन इसमें इस प्रकार बताई गई है: "कृष्ण की भक्ति सेवा की महिमा का संकेत देने वाले पूर्व उद्धृत श्लोकों को सुनने के परिणामस्वरूप, आपने परमानंदमय प्रेम के विभिन्न असाधारण अलौकिक परिवर्तनों को प्रकट किया।"

"नर-ज्ञान नहि" वाक्यांश का अर्थ है "आपको पदार्थ का उत्पाद नहीं माना जा सकता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)