श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 350
 
 
श्लोक  2.1.350 
যতেক বাখান’ তুমি,—সব সত্য হয
সবে যে উদ্দেশে পডি,—তার অর্থ নয”
यतेक वाखान’ तुमि,—सब सत्य हय
सबे ये उद्देशे पडि,—तार अर्थ नय”
 
 
अनुवाद
“आपने जो कुछ भी समझाया वह बिल्कुल सत्य है, लेकिन जिस उद्देश्य से हम अध्ययन कर रहे हैं वह अलग है।”
 
“Everything you explained is absolutely true, but the purpose for which we are studying is different.”
तात्पर्य
"तुमने जिसे विद्वद्रूढ़ि द्वारा प्रस्तुत किया है और प्रस्तुत कर रहे हो अर्थात शब्दों के अर्थ ही एक मात्र वास्तविक शाश्वत सत्य है | जबकि अज्ञद्रूढ़ि से हम जिस अर्थ का विवेचन करते हैं वह प्रतीत होता है अर्थ होने पर भी वास्तविक सत्य नहीं है अपितु वृथा व्याख्यान है |"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)