श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 347
 
 
श्लोक  2.1.347 
কত-ক্ষণে বাহ্য প্রকাশিলা বিশ্বম্ভর
চাহিযা সবার মুখ—লজ্জিত-অন্তর
कत-क्षणे बाह्य प्रकाशिला विश्वम्भर
चाहिया सबार मुख—लज्जित-अन्तर
 
 
अनुवाद
थोड़ी देर बाद विश्वम्भर ने अपनी बाह्य चेतना प्रकट की। वहाँ सबके चेहरे देखकर उन्हें शर्मिंदगी महसूस हुई।
 
After a while, Visvambhara regained consciousness. Seeing everyone's faces, he felt embarrassed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)