दन्ते निधाय तृणकं पादयोर निपत्य
कृत्वा च काकु शतमेतदहंग ब्रवीमि
हे साधव: सकलमेव विहाय दूरद
गौरांग चंद्र चरणे कुरुतानूराग
‘‘अपने दाँत के बीच वह तिनका दबाकर आप के चरणों में सैंकड़ों बार गिर जाता है और मधुर वचनों में निवेदन करता है कि हे महान आत्मा! कृपया जो कुछ भी आपने सीखा है, सबको दूर फेंक कर भगवान् गौरांग के चरणकमलों में आसक्ति रखें।’’
श्रीमद् भागवतम् (7.1.32) में नारद मुनि महाराज युधिष्ठिर से इस तरह कहते हैं : तस्मात केनाप्य उपायेन मन: कृष्णे निवेशयेत – ‘‘किसी भी तरह से, व्यक्ति को अपना मन कृष्ण को स्मरण करने में ही लगाना चाहिए।’’
