श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 343
 
 
श्लोक  2.1.343 
কৃষ্ণ মাতা, কৃষ্ণ পিতা, কৃষ্ণ প্রাণ ধন
চরণে ধরিযা বলি,—’কৃষ্ণে দেহ, মন’”
कृष्ण माता, कृष्ण पिता, कृष्ण प्राण धन
चरणे धरिया बलि,—’कृष्णे देह, मन’”
 
 
अनुवाद
"कृष्ण तुम्हारी माता हैं, कृष्ण तुम्हारे पिता हैं, कृष्ण तुम्हारे जीवन और धन हैं। मैं तुम्हारे चरणों में गिरकर विनती करता हूँ कि तुम अपने मन को कृष्ण के चिंतन में लगाओ।"
 
"Krishna is your mother, Krishna is your father, Krishna is your life and wealth. I fall at your feet and request you to concentrate your mind on Krishna."
तात्पर्य
चैतन्य चंद्रामृत में (९०) यह कथन किया गया है :

दन्ते निधाय तृणकं पादयोर निपत्य

कृत्वा च काकु शतमेतदहंग ब्रवीमि

हे साधव: सकलमेव विहाय दूरद

गौरांग चंद्र चरणे कुरुतानूराग

‘‘अपने दाँत के बीच वह तिनका दबाकर आप के चरणों में सैंकड़ों बार गिर जाता है और मधुर वचनों में निवेदन करता है कि हे महान आत्मा! कृपया जो कुछ भी आपने सीखा है, सबको दूर फेंक कर भगवान् गौरांग के चरणकमलों में आसक्ति रखें।’’

श्रीमद् भागवतम् (7.1.32) में नारद मुनि महाराज युधिष्ठिर से इस तरह कहते हैं : तस्मात केनाप्य उपायेन मन: कृष्णे निवेशयेत – ‘‘किसी भी तरह से, व्यक्ति को अपना मन कृष्ण को स्मरण करने में ही लगाना चाहिए।’’

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)