श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 342
 
 
श्लोक  2.1.342 
যাবত্ আছযে প্রাণ, দেহে আছে শক্তি
তাবত্ করহ কৃষ্ণ-পাদ-পদ্মে ভক্তি
यावत् आछये प्राण, देहे आछे शक्ति
तावत् करह कृष्ण-पाद-पद्मे भक्ति
 
 
अनुवाद
“जब तक तुम्हारे शरीर में जीवन और शक्ति है, तुम्हें कृष्ण के चरणकमलों की भक्ति करनी चाहिए।
 
“As long as you have life and strength in your body, you should worship the lotus feet of Krishna.
तात्पर्य
श्रीमद् भागवतम् (११.९.२९) में भिक्षु ब्राह्मण यादवों के राजा से इस प्रकार बोलते हैं:

लब्ध्वा सु-दुर्लभं इदं बहु-सम्भवांते

मानुष्यं अर्थ-दम्‌ अनित्यम्‌ अपीह धीरः

तूर्णं यतेत न पतेद्‌ अनु-मृत्यु यावन्

निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्‌

"बहुत जन्मों और मरणों के बाद व्यक्ति दुर्लभ मानव रूप प्राप्त करता है, जो अस्थायी होते हुए भी व्यक्ति को सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने का अवसर देता है। इसलिए एक संयमी व्यक्ति को जीवन की अंतिम पूर्णता के लिए तुरंत प्रयास करना चाहिए जब तक कि उसका शरीर, जो हमेशा मृत्यु के अधीन है, गिरकर मर न जाए। अंत में, सभी प्रकार के जीवन में इंद्रिय तृप्ति उपलब्ध है, जबकि कृष्ण चेतना केवल मनुष्य के लिए ही संभव है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)