लब्ध्वा सु-दुर्लभं इदं बहु-सम्भवांते
मानुष्यं अर्थ-दम् अनित्यम् अपीह धीरः
तूर्णं यतेत न पतेद् अनु-मृत्यु यावन्
निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्
"बहुत जन्मों और मरणों के बाद व्यक्ति दुर्लभ मानव रूप प्राप्त करता है, जो अस्थायी होते हुए भी व्यक्ति को सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने का अवसर देता है। इसलिए एक संयमी व्यक्ति को जीवन की अंतिम पूर्णता के लिए तुरंत प्रयास करना चाहिए जब तक कि उसका शरीर, जो हमेशा मृत्यु के अधीन है, गिरकर मर न जाए। अंत में, सभी प्रकार के जीवन में इंद्रिय तृप्ति उपलब्ध है, जबकि कृष्ण चेतना केवल मनुष्य के लिए ही संभव है।"
