পুত্র-বুদ্ধি ছাডি’ অজামিল সে স্মরণে
চলিলা বৈকুণ্ঠ, ভজ সে কৃষ্ণ-চরণে
पुत्र-बुद्धि छाडि’ अजामिल से स्मरणे
चलिला वैकुण्ठ, भज से कृष्ण-चरणे
अनुवाद
"यह स्मरण करके कि वह पवित्र नाम वास्तव में उसके पुत्र का नाम नहीं था, अजामिल को वैकुंठ की प्राप्ति हुई। इसलिए कृष्ण के चरणकमलों की पूजा करो।"
"Remembering that the holy name was not actually his son's name, Ajamila attained Vaikuntha. Therefore worship the lotus feet of Krishna."
तात्पर्य
यद्यपि बहुत पापी अजामिल ने सबसे पहले अपने पुत्र के ही संदर्भ में नारायण नाम का उच्चारण किया था, किन्तु जैसे ही उसने अपने पुत्र को अपने भोग-विषय-विचार से त्याग दिया और साथ ही साथ यह स्मरण किया कि नारायण का ध्वनि कंपन नारायण से भिन्न नहीं है, और कृष्ण का स्मरण करने से उत्पन्न नाम-आभा के प्रभाव से उसने तुरंत ही मुक्ति प्राप्त कर ली। इसके बाद वह वैकुण्ठ-राज्य में प्रवेश करने में सक्षम हो गया, जो इंद्रियों की पहुँच से परे और माया के अधिकार क्षेत्र से परे है।
अजामिल के जीवन के विवरण देने के लिए श्रीमद् भागवतम के छठे स्कंध, अध्याय एक के 21-68 छंदों को देखा जाना चाहिए, साथ ही अध्याय दो और तीन को भी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥