बकासुर की बहन पूतना के उद्धार को श्रीमद् भागवतम (10.6.35, 38) में महाराज परीक्षित को श्री शुकदेव गोस्वामी ने इस प्रकार वर्णित किया है: "पूतना हमेशा मानव बच्चों के खून के लिए तरसती रहती थी, और उस इच्छा के साथ वह कृष्ण को मारने आई; लेकिन उसने भगवान को अपना स्तन चढ़ाया, वह सबसे बड़ी उपलब्धि प्राप्त की। क्योंकि कृष्ण ने पूतना के शरीर को बहुत खुशी से गले लगाया और उसका स्तन चूसा, यद्यपि वह एक महान चुड़ैल थी, उसने आध्यात्मिक दुनिया में एक माँ का स्थान प्राप्त किया और इस तरह सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त की। तो गायों के बारे में क्या कहा जाए जिनके निपल्स को कृष्ण ने बहुत खुशी से चूसा और जिन्होंने अपने दूध को एक माँ की तरह ही स्नेह के साथ बहुत खुशी से पेश किया? "
इस श्लोक की पहली पंक्ति प्रभु को संदर्भित करती है, जिन्होंने सर्वोच्च गंतव्य को उन लोगों से सम्मानित किया जिन्हें उनके द्वारा मारा गया था। भक्ति-रसामृत-सिंधु (2.1.205) में इसकी पुष्टि इस प्रकार की गई है:
परभवं फेनिल-वकत्रतां च
बंधं च भीतिं च मृतिं च कृत्वा
पवर्ग-दातापि शिखंड-मौले
त्वं शास्त्र-बाणाम अपवर्ग दो ’सि
"हे कृष्ण, जिनके सिर पर मोर पंख से सजाया गया है, हालाँकि आप अपने शत्रुओं को पवर्ग - पराजय (हार), फेना-युक्त आनन (फोमिंग माउथ), बंधन (बंधन), भय (भयभीत) और मृत्यु (मृत्यु) की पाँच स्थितियों से सम्मानित करते हैं) - आप अंततः उन्हें अपवर्ग, या मुक्ति प्रदान करते हैं। "
कृष्ण के बकासुर और अघासुर की हत्या के विवरण के लिए, किसी को श्रीमद् भागवतम (10.11.47-53 और 10.12.13-35) देखना चाहिए।
