श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 338
 
 
श्लोक  2.1.338 
অঘ-বক-পূতনারে যে কৈলা মোচন
ভজ ভজ সেই নন্দ-নন্দন-চরণ
अघ-बक-पूतनारे ये कैला मोचन
भज भज सेइ नन्द-नन्दन-चरण
 
 
अनुवाद
“नन्दनन्दन के चरण कमलों की पूजा करो, जिन्होंने अघासुर, बकासुर और पूतना का उद्धार किया।
 
“Worship the lotus feet of Nandanandan, who saved Aghasur, Bakasura and Putana.
तात्पर्य
अघासुर का उद्धार श्रीमद् भागवतम (10.12.38-39) में महाराज परीक्षित को श्री शुकदेव गोस्वामी ने इस प्रकार वर्णित किया है: "कृष्ण सर्व कारणों का कारण हैं। भौतिक दुनिया के कारण और प्रभाव, उच्च और निम्न दोनों ही सर्वोच्च भगवान, मूल नियंत्रक द्वारा बनाए गए हैं। जब कृष्ण नंद महाराजा और यशोदा के पुत्र के रूप में प्रकट हुए, तो उन्होंने अपनी अकारण दया से ऐसा किया। इसलिए, उनके लिए अपनी असीम विपुलता का प्रदर्शन करना बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं था। वास्तव में, उन्होंने इतनी बड़ी दया दिखाई कि सबसे पापी दुष्ट, अघासुर को भी अपने सहयोगियों में से एक होने और सारूप्य-मुक्ति प्राप्त करने के लिए ऊंचा उठाया गया, जिसे भौतिक रूप से दूषित व्यक्तियों के लिए प्राप्त करना असंभव है। यदि कोई भी केवल एक बार बलपूर्वक सर्वोच्च भगवान के रूप को अपने दिमाग में लाता है, तो वह कृष्ण की दया से अघासुर की तरह सर्वोच्च मुक्ति प्राप्त कर सकता है। तो उन लोगों के बारे में क्या कहा जाए जिनके दिलों में सर्वोच्च भगवान प्रवेश करते हैं जब वे अवतार के रूप में प्रकट होते हैं, या जो हमेशा भगवान के चरण कमलों के बारे में सोचते हैं, जो सभी जीवित प्राणियों के लिए परमानंद के स्रोत हैं और जिनके द्वारा सभी भ्रम पूरी तरह से हटा दिया जाता है? "

बकासुर की बहन पूतना के उद्धार को श्रीमद् भागवतम (10.6.35, 38) में महाराज परीक्षित को श्री शुकदेव गोस्वामी ने इस प्रकार वर्णित किया है: "पूतना हमेशा मानव बच्चों के खून के लिए तरसती रहती थी, और उस इच्छा के साथ वह कृष्ण को मारने आई; लेकिन उसने भगवान को अपना स्तन चढ़ाया, वह सबसे बड़ी उपलब्धि प्राप्त की। क्योंकि कृष्ण ने पूतना के शरीर को बहुत खुशी से गले लगाया और उसका स्तन चूसा, यद्यपि वह एक महान चुड़ैल थी, उसने आध्यात्मिक दुनिया में एक माँ का स्थान प्राप्त किया और इस तरह सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त की। तो गायों के बारे में क्या कहा जाए जिनके निपल्स को कृष्ण ने बहुत खुशी से चूसा और जिन्होंने अपने दूध को एक माँ की तरह ही स्नेह के साथ बहुत खुशी से पेश किया? "

इस श्लोक की पहली पंक्ति प्रभु को संदर्भित करती है, जिन्होंने सर्वोच्च गंतव्य को उन लोगों से सम्मानित किया जिन्हें उनके द्वारा मारा गया था। भक्ति-रसामृत-सिंधु (2.1.205) में इसकी पुष्टि इस प्रकार की गई है:

परभवं फेनिल-वकत्रतां च

बंधं च भीतिं च मृतिं च कृत्वा

पवर्ग-दातापि शिखंड-मौले

त्वं शास्त्र-बाणाम अपवर्ग दो ’सि

"हे कृष्ण, जिनके सिर पर मोर पंख से सजाया गया है, हालाँकि आप अपने शत्रुओं को पवर्ग - पराजय (हार), फेना-युक्त आनन (फोमिंग माउथ), बंधन (बंधन), भय (भयभीत) और मृत्यु (मृत्यु) की पाँच स्थितियों से सम्मानित करते हैं) - आप अंततः उन्हें अपवर्ग, या मुक्ति प्रदान करते हैं। "

कृष्ण के बकासुर और अघासुर की हत्या के विवरण के लिए, किसी को श्रीमद् भागवतम (10.11.47-53 और 10.12.13-35) देखना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)