सक्रृन् मनः कृष्णपदारविन्दयोर
निवेशितं तद्गुण-रागि यैर इह
न ते यमं पाशभृताश च तद्भटान्
स्वप्नेऽपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृतः
"भले ही कृष्ण को पूरी तरह से न समझा हो, परन्तु जो व्यक्ति एक बार पूरी तरह से उनके चरण कमलों में समर्पण कर देते हैं और उनके नाम, रूप, गुणों और कालक्रम के प्रति आकर्षित हो जाते हैं, वे सभी पाप प्रतिक्रियाओं से पूरी तरह से मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि उन्होंने प्रायश्चित का सही तरीका स्वीकार कर लिया है। इस तरह आत्मसमर्पित आत्माएँ स्वप्न में भी यमराज या उनके आदेशों को ले जाने वालों को नहीं देखती हैं, जो बंधन के लिए रस्सियों से लैस होते हैं।"
नृसिंह पुराण में, यमराज निम्नलिखित शब्द बोलते हैं:
अहम अमरगणर्चितेना धात्रा यम
इति लोकहिताहिते नियुक्तः
हरि-गुरु-विमुखान् प्रशासामि मर्त्यान
हरिचरणप्रणतान् नमस् करोमि
"मुझे भगवान ब्रह्मा ने नियुक्त किया है, जिनकी पूजा देवता करते हैं, लोगों की पवित्र और अपवित्र गतिविधियों का न्याय करने के लिए। मैं भौतिकवादी फलदायी अभिनेताओं को कड़ी सजा देता हूँ, जो आध्यात्मिक गुरु और भगवान हरि के विरोधी हैं, और मैं वैष्णवों को नमन करता हूँ, जिन्होंने खुद को भगवान हरि के चरण कमलों में समर्पित कर दिया है।" स्कंद पुराण में कहा गया है:
ना ब्रह्मा न शिवाग्नीन्द्रा
नाहम ना अन्ये दिवौकसःशक्ताः
तुं निग्रहम कर्तुं
वैष्णवानां महात्मानं
"भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव, अग्नि, इंद्र, मैं (यमराज) और अन्य देवता व्यापक विचार वाले वैष्णवों को दंडित करने में असमर्थ हैं।"
