श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 330-334
 
 
श्लोक  2.1.330-334 
সর্ব-দেহে ধাতু-রূপে বৈসে কৃষ্ণ-শক্তি
তাহা-সনে করে স্নেহ, তাহানে সে ভক্তি
ভ্রম-বশে অধ্যাপক না বুঝযে ইহা
’হয’ ’নয’ ভাই-সব! বুঝ মন দিযা
এবে যাঙ্রে নমস্করি’ করি মান্য-জ্ঞান
ধাতু গেলে, তাঙ্রে পরশিলে করি স্নান
যে-বাপের কোলে পুত্র থাকে মহা-সুখে
ধাতু গেলে সে-ই পুত্র অগ্নি দেয মুখে
ধাতু-সṁজ্ঞাকৃষ্ণ-শক্তি বল্লভ সবার
দেখি,—ইহা দূষুক,—আছযে শক্তি কার্?
सर्व-देहे धातु-रूपे वैसे कृष्ण-शक्ति
ताहा-सने करे स्नेह, ताहाने से भक्ति
भ्रम-वशे अध्यापक ना बुझये इहा
’हय’ ’नय’ भाइ-सब! बुझ मन दिया
एबे याङ्रे नमस्करि’ करि मान्य-ज्ञान
धातु गेले, ताङ्रे परशिले करि स्नान
ये-बापेर कोले पुत्र थाके महा-सुखे
धातु गेले से-इ पुत्र अग्नि देय मुखे
धातु-सꣳज्ञाकृष्ण-शक्ति वल्लभ सबार
देखि,—इहा दूषुक,—आछये शक्ति कार्?
 
 
अनुवाद
"कृष्ण की शक्ति प्रत्येक जीव के शरीर में धातु या सक्रिय तत्त्व के रूप में निवास करती है। सारा स्नेह और भक्ति केवल उन्हीं के लिए है। मोह के कारण, गुरुजन इसे समझ नहीं पाते। फिर भी ध्यानपूर्वक विचार करें कि मैं सही हूँ या गलत। ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें हम अब प्रणाम और सम्मान देते हैं, लेकिन जब सक्रिय तत्त्व उनके शरीर को छोड़ देता है, तो हमें उन्हें स्पर्श करने के बाद स्नान करना चाहिए। जो पुत्र अपने पिता की गोद में सुखपूर्वक पला था, सक्रिय तत्त्व के निकल जाने के बाद अपने पिता के मुख से दाह-अग्नि का स्पर्श करता है। जिसे धातु कहा जाता है, वह सबके प्रिय कृष्ण की शक्ति है। क्या कोई ऐसा है जो इसे अस्वीकार कर सके?
 
"Krishna's energy resides in the body of every living being as dhatu, or active element. All affection and devotion are for Him alone. Due to attachment, the teachers fail to understand this. Yet, carefully consider whether I am right or wrong. There are individuals to whom we now offer obeisance and respect, but when the active element leaves their bodies, we must bathe after touching them. A son who was brought up happily in his father's lap, after the active element has left, touches the burning fire from his father's mouth. What is called dhatu is the energy of the beloved Krishna. Is there anyone who can deny this?"
तात्पर्य
श्‍लोक 330 की व्याख्या और श्लोक 334 की पहली पंक्ति के लिए, आद्य-खंड, अध्‍याय सात, श्‍लोक 54-55 का संदर्भ लिया जाना चाहिए|

श्रीमद्-भागवत (10.14.50-57) में श्री शुकदेव गोस्‍वामी महाराज परीक्षित से इस प्रकार कहते हैं, "हे राजन, प्रत्‍येक सृजित प्राणी के लिए सबसे प्रिय चीज निश्‍च‍य ही उसका स्वयं का अत्‍म है| अन्‍य सभी चीजों- जैसे कि बच्‍चे, संपत्ति इत्‍यादि - का प्रिय होना केवल आत्‍म के प्रिय होने के कारण है| इस कारण हे राजाओं में श्रेष्ठ, साकार आत्‍मा आत्‍म-केंद्रीत होती है: वह अपने शरीर और आत्‍म के प्रति अपने बच्‍चों, संपत्ति और घर जैसी कथित संपत्तियों के प्रति अधिक आसक्‍त रहता है| वास्‍तव में, हे श्रेष्ठ राजाओं, जो लोग शरीर को आत्‍म मानते हैं, उनके लिए वे चीजें जिनका महत्‍व केवल शरीर के साथ उनके संबंध में निहित है, वह कभी भी स्‍वयं शरीर जितनी प्रिय नहीं हो सकतीं| यदि कोई व्‍यक्ति शरीर को 'मैं' के स्‍थान पर 'मेरा' मानने की अवस्‍था में आ जाता है, तो वह निश्‍च‍य ही शरीर को अपने आत्‍म जितना प्रिय नहीं मानेगा| आखिरकार, शरीर के बूढ़ा और बेकार हो जाने पर भी जीते रहने की उसकी इच्‍छा प्रबल बनी रहती है| इसलिए साकार जीवों में से प्रत्‍येक के लिए उसका अपना अत्‍म सबसे प्रिय होता है और चल-अचल संपूर्ण भौतिक सृष्ट‍ि केवल इस आत्‍म की संतुष्टि के लिए विद्यमान है| तुम्‍हें कृष्‍ण को सभी जीवों की मूल आत्‍मा मानना चाहिए| समग्र ब्रह्‍मांड के लाभ के लिए वे उनकी अकारण करुणा के कारण एक साधारण मनुष्‍य के रूप में प्रकट हुए हैं| उन्‍होंने अपनी आंतरिक क्षमता के बल पर यह किया है| इस लोक में वे लोग जो भगवान कृष्‍ण को जैसा वे हैं वैसा समझते हैं वे सभी चीजों को, चाहे स्थिर हों या चलने वाली, भगवान के सर्वोच्‍च व्‍यक्तित्‍व के प्रकट रूपों के रूप में देखते हैं| ऐसे प्रबुद्ध व्‍यक्ति भगवान कृष्‍ण से अलग कोई यथार्थ को नहीं मानते| भौतिक प्रकृति का मूल, अप्रकट रूप सभी भौतिक चीजों का स्रोत है और उस सूक्ष्‍म भौतिक प्रकृति का भी स्रोत भगवान का सर्वोच्‍च व्‍यक्तित्‍व, कृष्‍ण है| फिर, क्‍या कोई ऐसी चीज निश्चित कर सकता है जो उनसे अलग हो|

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)