श्रीमद्-भागवत (10.14.50-57) में श्री शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित से इस प्रकार कहते हैं, "हे राजन, प्रत्येक सृजित प्राणी के लिए सबसे प्रिय चीज निश्चय ही उसका स्वयं का अत्म है| अन्य सभी चीजों- जैसे कि बच्चे, संपत्ति इत्यादि - का प्रिय होना केवल आत्म के प्रिय होने के कारण है| इस कारण हे राजाओं में श्रेष्ठ, साकार आत्मा आत्म-केंद्रीत होती है: वह अपने शरीर और आत्म के प्रति अपने बच्चों, संपत्ति और घर जैसी कथित संपत्तियों के प्रति अधिक आसक्त रहता है| वास्तव में, हे श्रेष्ठ राजाओं, जो लोग शरीर को आत्म मानते हैं, उनके लिए वे चीजें जिनका महत्व केवल शरीर के साथ उनके संबंध में निहित है, वह कभी भी स्वयं शरीर जितनी प्रिय नहीं हो सकतीं| यदि कोई व्यक्ति शरीर को 'मैं' के स्थान पर 'मेरा' मानने की अवस्था में आ जाता है, तो वह निश्चय ही शरीर को अपने आत्म जितना प्रिय नहीं मानेगा| आखिरकार, शरीर के बूढ़ा और बेकार हो जाने पर भी जीते रहने की उसकी इच्छा प्रबल बनी रहती है| इसलिए साकार जीवों में से प्रत्येक के लिए उसका अपना अत्म सबसे प्रिय होता है और चल-अचल संपूर्ण भौतिक सृष्टि केवल इस आत्म की संतुष्टि के लिए विद्यमान है| तुम्हें कृष्ण को सभी जीवों की मूल आत्मा मानना चाहिए| समग्र ब्रह्मांड के लाभ के लिए वे उनकी अकारण करुणा के कारण एक साधारण मनुष्य के रूप में प्रकट हुए हैं| उन्होंने अपनी आंतरिक क्षमता के बल पर यह किया है| इस लोक में वे लोग जो भगवान कृष्ण को जैसा वे हैं वैसा समझते हैं वे सभी चीजों को, चाहे स्थिर हों या चलने वाली, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के प्रकट रूपों के रूप में देखते हैं| ऐसे प्रबुद्ध व्यक्ति भगवान कृष्ण से अलग कोई यथार्थ को नहीं मानते| भौतिक प्रकृति का मूल, अप्रकट रूप सभी भौतिक चीजों का स्रोत है और उस सूक्ष्म भौतिक प्रकृति का भी स्रोत भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, कृष्ण है| फिर, क्या कोई ऐसी चीज निश्चित कर सकता है जो उनसे अलग हो|
