गौड़ीय वैष्णव समाज की स्थापना श्रीमद भक्तिविनोद ठाकुर ने चैतन्य युग की पांचवी शताब्दी के प्रारंभ में कलकत्ता में की थी। बंगाल में तब भी तथाकथित गौड़ीय अपने संप्रदाय के विषयों पर अभी तक चर्चा आरंभ नहीं किया था। किन्तु शीघ्र ही कलकत्ता में गौरंग समाज की स्थापना हुई जो सनातन वैदिक आज्ञाओं का पालन न करने वाला एक नवलीन संप्रदाय था। गौड़ीय वैष्णव समाज विश्व वैष्णव राज सभा की एक शाखा है। आधुनिक तार्किक अपनी अल्पदृष्टि के कारण यह कहते हैं कि प्राचीन साहित्य में वैष्णव समाज शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है, किन्तु यदि वे इस पुस्तक के विचाराधीन अंश का अध्ययन करें तो वे अपनी अज्ञानता समझकर उसे सुधार लेंगे। गौड़ीय वैष्णव समाज की विशेषताएं यह है कि वे अद्वैत के सिद्धांतों का सर्वथा पालन करते है। कृष्ण के प्रति भक्ति रखते हैं, सर्व शक्तियों से पूर्ण प्रभु में अपने को समर्पित करते हैं, और प्रभु के साथ वैष्णव आचार्यों के द्वारा प्रचारित चार प्रकार के संबंध बनाते हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने इस लोक में निष्काम पूजा की महिमा का प्रचार किया। सनातन परम नियंत्रक की सेवा से रहित शुष्क ज्ञान का विरोध, जन्म के स्थान पर गुणों के आधार पर वैष्णव धर्म को स्वीकार करना, धार्मिक ग्रंथों की सर्वोच्चता का स्वीकार, कर्म और ज्ञान से आवृत्त पंचोपासना की अनधिकृत प्रक्रिया का त्याग, और इनके अतिरिक्त और भी अनेक विशिष्टताएं हैं जिनका मध्यकालीन आचार्यों ने प्रचार नहीं किया था, गौड़ीय वैष्णव उपदेशों में पाई जाती हैं। किन्तु सबसे दुखद विषय यह है कि शुद्ध भक्ति सेवा के विरोधी व्यक्तियों के अभिमान और द्वेष ने कम या अधिक शुद्ध वैष्णव आचरण में बाधा डाली है। वैष्णव सम्राट् श्रील जगन्नाथ दास और उनके अनुयायी श्री श्रीमद भक्तिविनोद ठाकुर महाशय ने गौड़ीय वैष्णव समाज में प्रविष्ट अनेक विसंगतियों को सर्वथा दूर किया। इसलिए वर्तमान में इन शुद्ध उच्च वैष्णवों और उनके कृत्रिम प्रिय अनुयायियों को विश्वंवर प्रिय वैष्णव समाज संबोधित किया जा सकता है - "वैष्णवों का वह समाज जो विश्वंवर को प्रिय है।" जो कपटी व्यक्ति इस समाज के शत्रु हैं, वे गौड़ीय वैष्णव समाज के लिए असीम अशुभ रचते हैं दूसरे शब्दों में, वे श्री गौरासुंदर के प्रियजनों के विरोधी होने के कारण अप्रिय हैं।
