श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.1.3 
জয জয জয বিশ্বম্ভর দ্বিজ-রাজ
জয বিশ্বম্ভর-প্রিয বৈষ্ণব সমাজ
जय जय जय विश्वम्भर द्विज-राज
जय विश्वम्भर-प्रिय वैष्णव समाज
 
 
अनुवाद
ब्राह्मणों के राजा विश्वम्भर की जय हो! विश्वम्भर के प्रिय भक्तों के समुदाय की जय हो!
 
Victory to Visvambhar, the king of Brahmins! Victory to the community of Visvambhar's beloved devotees!
तात्पर्य
विश्वंभर 'द्विज-राज' और विश्वंभर-प्रिय 'वैष्णव समाज' वाक्यावली की व्याख्या निम्नानुसार की गई है: हालाँकि श्री गौरासुंदर पूर्णतः ब्राह्मणों द्वारा पूजनीय प्रभु की पूर्ण अभिव्यक्ति हैं, लेकिन वे ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ हैं; और परमहंस गुरुओं या सभी वर्णों और आश्रमों के भक्तों का समाज उनके लिए सबसे प्रिय है। जिन व्यक्तियों ने संस्कारों या शुद्धिकरण प्रक्रियाओं की प्रक्रिया नहीं की है, उन्हें एक बार जन्मे शूद्र के रूप में जाना जाता है, और जिन व्यक्तियों ने संस्कारों को अंजाम दिया है, उन्हें द्विज या दो बार जन्मे के रूप में जाना जाता है। हालाँकि क्षत्रियों और वैश्यों को भी दो बार जन्मे के रूप में जाना जाता है, लेकिन द्विज-राज वाक्यांश का तात्पर्य केवल ब्राह्मण से हो सकता है। इस भौतिक दुनिया में सशर्त आत्माएँ बीज और गर्भ के कारण पापपूर्ण गतिविधियों में उलझने के योग्य हैं, जिससे वे पैदा हुए थे, इसलिए सभी अवतरित आत्माओं को अपनी स्वाभाविक रूप से विरासत में मिली पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं का प्रतिकार करने के लिए शुद्धिकरण प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। भगवान विश्वंभर संस्कारों के प्रति उदासीन थे; उन्होंने न तो उनके पालन को प्रोत्साहित किया और न ही विरोध किया। वह भक्ति सेवा के अनुकूल दैव-वर्णाश्रम सिद्धांतों के प्रति आंशिक थे; अभक्त या अदैव-वर्णाश्रम सिद्धांतों को उनके द्वारा सराहा नहीं गया। उन्होंने उन वास्तविक आश्रमों और उन वर्णों को स्वीकार किया जो भक्ति सेवा के अनुकूल व्यवसायों पर आधारित दैव-वर्णाश्रम के रूप में थे। इसलिए भक्तों का समाज उन्हें प्रिय है। अभक्तों के समाज में कर्म-कांड और अवैयक्तिकता पर विशेष बल दिया जाता है, लेकिन प्रभु के प्रकट होने से बहुत पहले दक्षिण भारत में श्री वैष्णवों और तत्ववादी वैष्णवों का समाज प्रमुख था। प्रभु ने भक्तों या माधव-गौड़ीय-समाज के वास्तविक समाज को सबसे प्रिय माना। उन्होंने कर्नाटक के वास्तविक वैष्णव समाज से संबंधित ब्राह्मण परिवार में जन्मे श्री सनातन और श्री रूप प्रभु जैसे माधव-गौड़ीय ब्राह्मणों को अपने प्रिय वैष्णव आचार्यों के रूप में स्थापित किया। इसके अलावा, उन्होंने श्री वैष्णवों के समाज से दो प्रभुओं, श्रीपाद प्रबोधानंद और श्रीपाद गोपाल भट्ट को स्वीकार किया और उन्हें अपने प्रिय भक्तों के रूप में स्थापित किया। यद्यपि दक्षिण भारत के श्री-सम्प्रदाय और ब्रह्म-सम्प्रदाय श्री गौरासुंदर को प्रिय हैं, लेकिन उनका अपना श्री गौड़ीय-सम्प्रदाय सबसे प्रिय है। जैसे-जैसे समय बीतता गया, पंचोपाकों जैसे स्मार्तों के विचारों से गौड़ीय वैष्णव समाज का व्यवहार और अभ्यास बहुत परेशान था, पाँच देवताओं के उपासक। इसलिए भगवान ने श्री माधव ब्राह्मण समाज में जन्मे श्रीमान सनातन गोस्वामीपाद को हरि-भक्ति-विलास नामक वैष्णव स्मृति को संकलित करने का आदेश दिया। चूंकि श्रीपाद गोपाल भट्ट गोस्वामी, जो श्री रामानुज वैष्णव समाज में प्रकट हुए थे, श्रीमान सनातन और रूप प्रभु दोनों को बहुत प्रिय थे, श्रीमान सनातन गोस्वामी ने विस्तार और संपादन के लिए उन्हें हरि-भक्ति-विलास का अपना संकलन दिया। इसलिए श्री हरि-भक्ति-विलास और उसी क्रम में, सत-क्रिया-सार-दीपिका और संस्कार-दीपिका को गौड़ीय वैष्णव स्मृति और सामाजिक संहिताओं पर गौड़ीय वैष्णव ग्रंथों के रूप में स्वीकार किया जाता है। श्री गौरासुंदर के अनुयायी वैष्णव समाज में हमें कुछ विशेष विशेषताएँ मिलती हैं। चूंकि स्मार्तों के सिद्धांत ने वैष्णव स्मृतियों के मार्ग में विभिन्न बाधाएँ उत्पन्न की हैं, इसलिए श्री ध्यानचंद्र, श्री रसिकानंद और हाल ही में, श्री श्रीमद भक्तिविनोद ठाकुर महाशय ने श्री गौर की सीध में गौड़ीय वैष्णव समाज के वास्तविक अनंत लाभ के लिए आकांक्षा की है।

गौड़ीय वैष्णव समाज की स्थापना श्रीमद भक्तिविनोद ठाकुर ने चैतन्य युग की पांचवी शताब्दी के प्रारंभ में कलकत्ता में की थी। बंगाल में तब भी तथाकथित गौड़ीय अपने संप्रदाय के विषयों पर अभी तक चर्चा आरंभ नहीं किया था। किन्तु शीघ्र ही कलकत्ता में गौरंग समाज की स्थापना हुई जो सनातन वैदिक आज्ञाओं का पालन न करने वाला एक नवलीन संप्रदाय था। गौड़ीय वैष्णव समाज विश्व वैष्णव राज सभा की एक शाखा है। आधुनिक तार्किक अपनी अल्पदृष्टि के कारण यह कहते हैं कि प्राचीन साहित्य में वैष्णव समाज शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है, किन्तु यदि वे इस पुस्तक के विचाराधीन अंश का अध्ययन करें तो वे अपनी अज्ञानता समझकर उसे सुधार लेंगे। गौड़ीय वैष्णव समाज की विशेषताएं यह है कि वे अद्वैत के सिद्धांतों का सर्वथा पालन करते है। कृष्ण के प्रति भक्ति रखते हैं, सर्व शक्तियों से पूर्ण प्रभु में अपने को समर्पित करते हैं, और प्रभु के साथ वैष्णव आचार्यों के द्वारा प्रचारित चार प्रकार के संबंध बनाते हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने इस लोक में निष्काम पूजा की महिमा का प्रचार किया। सनातन परम नियंत्रक की सेवा से रहित शुष्क ज्ञान का विरोध, जन्म के स्थान पर गुणों के आधार पर वैष्णव धर्म को स्वीकार करना, धार्मिक ग्रंथों की सर्वोच्चता का स्वीकार, कर्म और ज्ञान से आवृत्त पंचोपासना की अनधिकृत प्रक्रिया का त्याग, और इनके अतिरिक्त और भी अनेक विशिष्टताएं हैं जिनका मध्यकालीन आचार्यों ने प्रचार नहीं किया था, गौड़ीय वैष्णव उपदेशों में पाई जाती हैं। किन्तु सबसे दुखद विषय यह है कि शुद्ध भक्ति सेवा के विरोधी व्यक्तियों के अभिमान और द्वेष ने कम या अधिक शुद्ध वैष्णव आचरण में बाधा डाली है। वैष्णव सम्राट् श्रील जगन्नाथ दास और उनके अनुयायी श्री श्रीमद भक्तिविनोद ठाकुर महाशय ने गौड़ीय वैष्णव समाज में प्रविष्ट अनेक विसंगतियों को सर्वथा दूर किया। इसलिए वर्तमान में इन शुद्ध उच्च वैष्णवों और उनके कृत्रिम प्रिय अनुयायियों को विश्वंवर प्रिय वैष्णव समाज संबोधित किया जा सकता है - "वैष्णवों का वह समाज जो विश्वंवर को प्रिय है।" जो कपटी व्यक्ति इस समाज के शत्रु हैं, वे गौड़ीय वैष्णव समाज के लिए असीम अशुभ रचते हैं दूसरे शब्दों में, वे श्री गौरासुंदर के प्रियजनों के विरोधी होने के कारण अप्रिय हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)