श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 297
 
 
श्लोक  2.1.297 
তিন পুত্র তাঙ্র কৃষ্ণ-পদ-মকরন্দ
কৃষ্ণানন্দ, জীব, যদুনাথ-কবিচন্দ্র
तिन पुत्र ताङ्र कृष्ण-पद-मकरन्द
कृष्णानन्द, जीव, यदुनाथ-कविचन्द्र
 
 
अनुवाद
उनके तीन पुत्र - कृष्णानंद, जीव और यदुनाथ कविचंद्र - कृष्ण के चरण कमलों पर मधुमक्खियों की तरह रहते थे।
 
His three sons – Krishnananda, Jiva and Yadunath Kavichandra – lived like bees at the lotus feet of Krishna.
तात्पर्य
कृष्णानंद, गंगादास पंडितजी के प्रमुख शिष्यों में से एक थे (आदि-खंड 8.38)। जगई और माधाई के उद्धार के पश्चात वे जल में विहार करते हुए प्रभु और उनके साथियों से मिले (मध्य-खंड 13.337), और वे नित्यानंद प्रभु के एक साथी थे (चै. च. आदि 11.50)। जीव (पंडित) के संदर्भ में, अंत्य-खंड (5.751) में लिखा है: ''जीव पंडित उदार और अति भाग्यशाली थे। भगवान नित्यानंद ने उनके घर में विविध लीलाओं का आनंद लिया।'' चैतन्य चरितामृत (आदि 11.44) में लिखा है: ''श्री जीव पंडित ने श्री नित्यानंद प्रभु के गुणों का गुणगान किया।'' गौरा-गणोद्देश-दीपिका (169) के अनुसार वे कृष्ण की लीलाओं में वृजवासी इंदिरा के रूप में अवतरित हुए थे। यदुनंदन कविचंद्र के बारे में, अंत्य-खंड (5.735) में लिखा है: ''यदुनंदन कविचंद्र कृष्ण के लिए प्रेम के अलौकिक भावों से पूर्ण थे। नित्यानंद निरंतर उन पर अपनी कृपा बरसाते थे।'' चैतन्य चरितामृत (आदि 11.35) में लिखा है: ''यदुनंदन कविचंद्र एक महान भक्त थे। भगवान नित्यानंद प्रभु हमेशा उनके हृदय में नृत्य करते थे।''
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)