| श्री चैतन्य भागवत » खण्ड 2: मध्य-खण्ड » अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश » श्लोक 288-290 |
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| | | | श्लोक 2.1.288-290  | প্রভু বলে,—“সন্ধি-কার্য-জ্ঞান নাহি যার
কলি-যুগে ’ভট্টাচার্য’-পদবী তাহার
শব্দ-জ্ঞান নাহি যার, সে তর্ক বাখানে
আমারে ত’ প্রবোধিতে নারে কোন-জনে
যে আমি খণ্ডন করি, যে করি স্থাপন
দেখি,—তাহা অন্যথা করুক কোন্ জন?” | प्रभु बले,—“सन्धि-कार्य-ज्ञान नाहि यार
कलि-युगे ’भट्टाचार्य’-पदवी ताहार
शब्द-ज्ञान नाहि यार, से तर्क वाखाने
आमारे त’ प्रबोधिते नारे कोन-जने
ये आमि खण्डन करि, ये करि स्थापन
देखि,—ताहा अन्यथा करुक कोन् जन?” | | | | | | अनुवाद | | भगवान ने कहा, "कलियुग में जिसे शब्दों के संयोग का ज्ञान नहीं है, उसे भट्टाचार्य की उपाधि दी जाती है। और जिसे व्याकरण का ज्ञान नहीं है, वह तर्क समझाने में लगा रहता है। परन्तु इनमें से कोई भी मुझे परास्त नहीं कर सकता। मैं जिस प्रकार किसी सूत्र का खंडन और पुनर्स्थापन करता हूँ, उसे कौन चुनौती दे सकता है?" | | | | The Lord said, "In Kaliyuga, one who does not know the combination of words is given the title of Bhattacharya. And one who does not know grammar is busy explaining logic. But none of these can defeat me. Who can challenge the way I refute and reestablish a sutra?" | |
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