श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 277
 
 
श्लोक  2.1.277 
ভদ্রাভদ্র মূর্খ দ্বিজ জানিবে কেমনে?
ইহা জানি’ ’কৃষ্ণ’ বল, কর, অধ্যযনে
भद्राभद्र मूर्ख द्विज जानिबे केमने?
इहा जानि’ ’कृष्ण’ बल, कर, अध्ययने
 
 
अनुवाद
"अज्ञानी द्विज कैसे जान पाएगा कि क्या उचित है और क्या अनुचित? यह जानकर, तुम्हें कृष्ण का नाम जपना चाहिए और अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
 
“How can an ignorant twice-born person know what is right and what is wrong? Knowing this, you should chant the name of Krishna and concentrate on your studies.
तात्पर्य
शब्द भद्राभद्र भद्र ( श्रेयः, या अन्तिम लाभ) और अभद्र ( प्रेयः, या अस्थायी संतुष्टि) शब्दों का मेल है और इसका अर्थ है "अच्छा और बुरा," "लाभकारी और गैर-लाभकारी," "शुभ और अशुभ" या "उचित और अनुचित।"

"यद्यपि वैदिक अध्ययन से रहित एक मूर्ख व्यक्ति को तथाकथित ब्राह्मण कहा जा सकता है, वह अच्छे और बुरे के बीच भेद करने के योग्य नहीं है। इसलिए, यदि आपके निर्देशों से आपके छात्र शास्त्रों के अपने अध्ययन में लापरवाह हो जाते हैं और केवल 'कृष्ण कृष्ण' का जाप करते हैं, तो वे यह नहीं समझ पाएंगे कि क्या सही है और क्या गलत।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)