श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 276
 
 
श्लोक  2.1.276 
ইহা জানি’ ভাল-মতে কর’ অধ্যযন
অধ্যযন হৈলে সে বৈষ্ণব-ব্রাহ্মণ
इहा जानि’ भाल-मते कर’ अध्ययन
अध्ययन हैले से वैष्णव-ब्राह्मण
 
 
अनुवाद
"यह सब स्मरण रखते हुए, अपने पाठों का उचित ढंग से अभ्यास करो। उचित अध्ययन से ही कोई वैष्णव ब्राह्मण बन सकता है।"
 
"Keeping all this in mind, practice your lessons properly. Only through proper study can one become a Vaishnava Brahmin."
तात्पर्य
"मेरे निर्देशों के अनुसार, अब आपको भगवान की भक्ति सेवा को समझाने का काम छोड़ देना चाहिए और शास्त्रों के अध्ययन और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। शास्त्रों के अध्ययन के परिणामस्वरूप, आप और आपके छात्र वास्तव में वैष्णव ब्राह्मण बन जाएंगे। केवल वेदों और वेदों के अनुरूप साहित्य का अध्ययन करके ही व्यक्ति वैष्णव ब्राह्मण बन सकता है। यदि व्यक्ति आचार्य के मार्गदर्शन में शुद्धिकरण प्रक्रिया से नहीं गुजरता है और वेदों के अध्ययन के प्रति उदासीन हो जाता है, तो उसे विष्णु की भक्ति सेवा को प्राप्त करने में बाधाओं का सामना करना पड़ेगा।" चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.65) में कहा गया है:

शास्त्र-युक्त्ये सुनिपुण, दृढ़-श्रद्धा यांरा

उत्तम-अधिकारीे सेई तारये संसार

"जो तर्क-वितर्क, तर्क और प्रकट शास्त्रों में निपुण है और जिसकी कृष्ण में दृढ़ आस्था है, उसे सर्वोच्च भक्त के रूप में वर्गीकृत किया गया है। वह पूरे विश्व को मुक्त कर सकता है।" भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.2.17) में कहा गया है:

शास्त्रे युक्तौ च निपुणः

सर्वथा दृढ़-निश्चयः

प्रौढ़-श्रद्धोधिकारी यः

स भक्तव उत्तमो मतः

"जो तर्क और प्रकट शास्त्रों की समझ में निपुण है, और जिसमें हमेशा दृढ़ विश्वास और गहरी आस्था है जो अंधी नहीं है, उसे भक्ति सेवा में सर्वोच्च भक्त माना जाना चाहिए।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)