श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  2.1.27-28 
যাঙ্র পাদোদক লাগি’ গঙ্গার মহত্ত্ব
শিরে ধরি’ শিব জানে পাদোদক-তত্ত্ব
সে চরণ-উদক-প্রভাবে সেই স্থান
জগতে হৈল ’পাদোদক-তীর্থ’ নাম”
याङ्र पादोदक लागि’ गङ्गार महत्त्व
शिरे धरि’ शिव जाने पादोदक-तत्त्व
से चरण-उदक-प्रभावे सेइ स्थान
जगते हैल ’पादोदक-तीर्थ’ नाम”
 
 
अनुवाद
"भगवान के चरणकमलों के स्पर्श से गंगाजी महिमावान हो गईं और भगवान शिव ने उस जल को अपने सिर पर धारण करके उसकी महिमा को अनुभव किया। भगवान के चरणकमलों को धोने वाले जल के प्रभाव से वह स्थान पादोडक तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।"
 
"By the touch of the Lord's feet, Gangaji became glorified and Lord Shiva felt its glory by holding that water on his head. Due to the effect of the water washing the Lord's feet, that place became famous as Padodak Tirtha."
तात्पर्य
श्रीमद्भागवतम (१.१८.२१) में कहा गया है:

अथापि यत्पादनखावासरष्टं जगत विरिंचोपहृतार्हणाम्भः

शेषं पुनात्यन्यतमो मुकुंदात को नाम लोके भगवत्पदार्थः।

"भगवान श्री कृष्ण के अतिरिक्त और कौन परमेश्वर के नाम के योग्य हो सकता है? ब्रह्माजी ने उनके चरणों के नाखूनों से निकले हुए जल को इकठ्ठा किया, ताकि भगवान शिव को पूजा के लिए स्वागत किया जा सके। यह जल [गंगा] सम्पूर्ण ब्रह्मांड को पवित्र कर रहा है, जिसमें स्वयं भगवान शिव भी शामिल हैं।"

श्रीमद्भागवतम (३.२८.२२) में कहा गया है:

यच्चौचनिःसृतसरित्प्रवरौदकेन

तीर्थेन मूर्ध्नि अधि कृतेन शिवः शिवोऽभूत्

ध्यातुर मनःशमलशैलनिसृष्टवज्रं

ध्यायेच्चिरं भगवतश्चरणारविंदम्

"गंगा के पवित्र जल, जिसका स्रोत भगवान के चरण-कमलों को धोने वाले जल से है, को अपने शिर पर धारण करके धन्य भगवान शिव और भी अधिक धन्य हो जाते हैं। भगवान के चरण ध्यान करने वाले भक्त के मन रूपी पाप के पहाड़ को चूर-चूर करने के लिए फेंके गए वज्र की तरह काम करते हैं। इसलिए व्यक्ति को भगवान के चरण-कमलों का लंबे समय तक ध्यान करना चाहिए।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)