अथापि यत्पादनखावासरष्टं जगत विरिंचोपहृतार्हणाम्भः
शेषं पुनात्यन्यतमो मुकुंदात को नाम लोके भगवत्पदार्थः।
"भगवान श्री कृष्ण के अतिरिक्त और कौन परमेश्वर के नाम के योग्य हो सकता है? ब्रह्माजी ने उनके चरणों के नाखूनों से निकले हुए जल को इकठ्ठा किया, ताकि भगवान शिव को पूजा के लिए स्वागत किया जा सके। यह जल [गंगा] सम्पूर्ण ब्रह्मांड को पवित्र कर रहा है, जिसमें स्वयं भगवान शिव भी शामिल हैं।"
श्रीमद्भागवतम (३.२८.२२) में कहा गया है:
यच्चौचनिःसृतसरित्प्रवरौदकेन
तीर्थेन मूर्ध्नि अधि कृतेन शिवः शिवोऽभूत्
ध्यातुर मनःशमलशैलनिसृष्टवज्रं
ध्यायेच्चिरं भगवतश्चरणारविंदम्
"गंगा के पवित्र जल, जिसका स्रोत भगवान के चरण-कमलों को धोने वाले जल से है, को अपने शिर पर धारण करके धन्य भगवान शिव और भी अधिक धन्य हो जाते हैं। भगवान के चरण ध्यान करने वाले भक्त के मन रूपी पाप के पहाड़ को चूर-चूर करने के लिए फेंके गए वज्र की तरह काम करते हैं। इसलिए व्यक्ति को भगवान के चरण-कमलों का लंबे समय तक ध्यान करना चाहिए।"
