श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 264
 
 
श्लोक  2.1.264 
সর্বদা বলেন ’কৃষ্ণ’—পুলকিত-অঙ্গ
ক্ষণে হাস্য, হুঙ্কার, করযে বহু রঙ্গ
सर्वदा बलेन ’कृष्ण’—पुलकित-अङ्ग
क्षणे हास्य, हुङ्कार, करये बहु रङ्ग
 
 
अनुवाद
"वे सदैव कृष्ण का नाम जपते रहते हैं और उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कभी-कभी वे विभिन्न भावों में हँसते या ज़ोर से चिल्लाते हैं।"
 
"They are always chanting Krishna's name and their hairs stand on end. Sometimes they laugh or shout loudly in various expressions."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)