श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 255
 
 
श्लोक  2.1.255 
কৃষ্ণের ভজন কহি—সম্যক্ আম্নায
আদি-মধ্য-অন্তে কৃষ্ণ ভজন বুঝায”
कृष्णेर भजन कहि—सम्यक् आम्नाय
आदि-मध्य-अन्ते कृष्ण भजन बुझाय”
 
 
अनुवाद
“मैं तुम्हें कृष्ण की पूजा के बारे में समझा रहा हूँ, जो समस्त वैदिक साहित्य के आदि, मध्य और अंत का तात्पर्य है।”
 
“I am explaining to you the worship of Krishna, which is the beginning, middle and end of all Vedic literature.”
तात्पर्य
सम्यक् आम्नाय वाक्यांश की व्याख्या इस प्रकार की जाती है: जो शास्त्र भगवान विष्णु की श्रेष्ठता के बारे में शिक्षा देते हैं, उन्हें आम्नाय कहा जाता है; जो शास्त्र महान ऋषियों द्वारा हमेशा चर्चा की जाती हैं, जिन्होंने सर्वोच्च ब्रह्म का एहसास कर लिया है, उन्हें आम्नाय कहा जाता है; और जो शास्त्र मनुष्यों को सर्वोच्च धार्मिक सिद्धांतों के बारे में शिक्षा देते हैं ताकि वे जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकें, उन्हें आम्नाय कहा जाता है। श्रीमद् भागवतम (10.47.33) में पाये शब्द समाम्नाय की अपनी टीका में, श्रीधर स्वामीपाद व्याख्या करते हैं, समाम्नायो वेद: "वेदों का ज्ञान शिष्य संबंध के माध्यम से प्राप्त होता है"।

भगवद-गीता (15.15) में भगवान कृष्ण अर्जुन से इस प्रकार बात करते हैं:

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो

मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो

वेदान्त-कृद वेद-विदेव चात्र

"मैं सबके हृदय में बैठा हूँ, और मुझसे स्मरण, ज्ञान और विस्मृति आती है। सभी वेदों द्वारा, मुझे जाना जाना है। वास्तव में, मैं वेदांत का संकलनकर्ता हूँ, और मैं वेदों का ज्ञाता हूँ"।

श्रीमद् भागवतम (12.13.1) में, श्री सूत गोस्वामी शौनक के नेतृत्व में ऋषियों से इस प्रकार कहते हैं:

यम ब्रह्मा वरुणेन्द्र-रुद्र-मरुतः स्तुवंति दिव्यैः स्तवैः

वेदः साँग-पद-क्रमोपनिषदैर्गायंति यं सामा-गाः

ध्यानवस्थित-तद-गतैन मनसा पश्यंति यं योगिनो

यस्यांतम न विदुः सुरासुर-गणा देवाय तस्मै नमः

"उस व्यक्तित्व के प्रति जिसे ब्रह्मा, वरुण, इंद्र, रुद्र और मरुद् दिव्य भजनों के द्वारा स्तुति करते हैं और सभी उनके कोरोलरीज, पद-कर्म और उपनिषदों के साथ वेदों का पाठ करते हैं, जिनके लिए साम वेद के चैटर हमेशा गाते हैं, जिन परिपूर्ण योगियों ने तंद्रा में खुद को स्थिर करके अपने दिमाग के भीतर देखते हैं और खुद को उसमें समाहित करते हैं, और जिसकी सीमा किसी भी देवता या दानव द्वारा कभी नहीं पाई जा सकती है - उस सर्वोच्च भगवान के प्रति मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ"।

श्रीमद् भागवतम (11.21.42-43) में भगवान कृष्ण उद्धव से निम्नलिखित शब्द बोलते हैं:

किं विधत्ते किमाचष्टे

किमनूद्या विकल्पयत्

इत्यस्या हृदयं लोके

नान्यो मद् वेद कश्चन

मां विधत्तेभिधत्ते माँ

विकल्प्यापोह्यते त्व अहम्

एतावान सर्व-वेदार्थः

शब्द आस्थाय माँ भिदाम

माया-मात्रम अनूद्यान्ते

प्रतिषिध्य प्रसीदति

"पूरे विश्व में कोई भी नहीं पर मैं वैदिक ज्ञान के गोपनीय उद्देश्य को वास्तव में समझता हूँ। इसलिए लोग नहीं जानते कि कर्म-काण्ड के अनुष्ठानिक निषेधाज्ञाओं में वेद वास्तव में क्या निर्धारित कर रहे हैं, या उपासना-कांड में पाये गए पूजा के सूत्रों में वास्तव में किस वस्तु को संकेत दिया जा रहा है, या जिसे वेदों के ज्ञान-कांड अनुभाग में विभिन्न परिकल्पनाओं के माध्यम से विस्तृत रूप से चर्चा की जाती है। मैं वह अनुष्ठानिक यज्ञ हूँ जिसकी वेदों में आज्ञा दी गई है, और मैं पूजा करने योग्य देवता हूँ। यह मैं ही हूँ जो विभिन्न दार्शनिक परिकल्पनाओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता हूँ, और यह मैं ही हूँ जिसे दार्शनिक विश्लेषण द्वारा अकेले ही खंडित किया जाता है। इस प्रकार पारलौकिक ध्वनि कंपन मुझे सभी वैदिक ज्ञान के आवश्यक अर्थ के रूप में स्थापित करता है। वेद, सभी भौतिक द्वंद्व को मेरी भ्रामक शक्ति के अलावा और कुछ नहीं मानते हुए, अंततः इस द्वंद्व को पूरी तरह से नकारते हैं और अपनी स्वयं की संतुष्टि प्राप्त करते हैं।

हरि-वंश में कहा गया है: "पूरे वेदों, रामायण, पुराणों और महाभारत में, शुरुआत से अंत तक, केवल सर्वोच्च भगवान हरि की महिमा गाई जाती है"।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)