भौतिक चीज़ों से जुड़ी गतिविधियों की निंदा को निम्नलिखित कथनों में वर्णित किया गया है. श्रीमद भागवतम (3.23.56) में भगवान कपिल अपनी माँ देवहूति से कहते हैं:
"नेह यत कर्म धर्मय
ना विरागाय कल्पते
ना तीर्थ-पाद-सेवायै
जीवन अपि मृतौ हि सः"
"कोई भी जिसका कर्म उसे धार्मिक जीवन की ओर नहीं उठाता, किसी का भी धार्मिक रीति-रिवाज़ उसे वैराग्य की ओर नहीं उठाते, और किसी की भी वैराग्य की स्थिति उसे भगवान की भक्ति की ओर नहीं ले जाती है, उसे मरा हुआ माना जाना चाहिए, भले ही वह साँस ले रहा हो."
श्रीमद भागवतम (1.2.8) में श्री सूत गोस्वामी शौनक के नेतृत्व वाले संतों से कहते हैं:
"धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसाँ
विश्वकेसेन-कथासु यः
न उत्पायेद यदि रतिम्
श्रम एव हि केवलम"
"किसी मनुष्य के द्वारा अपनी स्थित के अनुसार किए गए व्यवसायिक कार्य केवल व्यर्थ श्रम बन जाते हैं, अगर वे भगवान के संदेश के प्रति आकर्षण नहीं पैदा करते."
श्रीमद भागवतम (1.5.12) में श्री नारद मुनि श्री व्यास से कहते हैं:
"नैष्कर्मयम् अापि अच्युत-भाव-वर्जितम्
ना शोभते ज्ञानम् अलं निरंजनम
कुतः पुनः शश्वत अभद्रम् ईश्वरे
ना कार्पितम् कर्म यद अपि अकारणम्"
"आत्म-साक्षात्कार का ज्ञान, भले ही भौतिक चीज़ों से रहित हो, अगर वह अच्युत [भगवान] की अवधारणा से रहित हो तो अच्छा नहीं लगता. तो, फलदायी क्रियाओं का क्या उपयोग है, जो कि प्रकृति से ही शुरू से ही दर्दपूर्ण और स्वभाव से नश्वर होती हैं, अगर उनका उपयोग भगवान की भक्ति पूर्ण सेवा के लिए नहीं होता?"
भगवद-गीता (9.21) में भगवान कृष्ण अर्जुन को निर्देश देते हैं:
"ते तं भूक्त्वा स्वर्ग-लोकं विशालम्
क्षीणे पुण्ये मत्य-लोकं विशन्ति
एवं त्रयी-धर्मम् अनुप्रपन्ना
गत आगतम् काम-कामा लभन्ते"
"जब वे इस तरह से स्वर्ग के विशाल आनंद और अपने पुण्य कर्मों के परिणामों का आनंद ले चुके होते हैं, वे फिर से इस मृत्युलोक पर लौट आते हैं. इस प्रकार जो लोग तीनों वेदों के सिद्धांतों का पालन करके इंद्रियों के आनंद की तलाश करते हैं, वे केवल बार-बार जन्म और मृत्यु को प्राप्त करते हैं."
मुंडक उपनिषद (1.2.7) में कहा गया है:
"प्लवा ह्य एते अदृढा यज्ञ-रूंपा
अष्टादशोक्तम् अवरं येषु कर्म
एतत् श्रेयो ये 'अभिनंदति मूढा
जरा-मृत्युं ते पुनः एव अपि यन्ति"
"अठारह पुरोहितों के साथ सावधानी से किए गए कर्म यज्ञ भी भौतिक अस्तित्व के सागर को पार करने के लिए अविश्वसनीय नावें हैं. वे भ्रमित आत्माएँ जो भौतिक रूप के बलिदान की आराधना करती हैं, यह सोचकर कि वे सबसे बड़े आध्यात्मिक लाभ की ओर ले जाते हैं, वे मूर्ख होते हैं जो बार-बार जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और बीमारी के दुखों का सामना करते हैं."
फिर मुंडक उपनिषद (1.2.9) में कहा गया है:
"यत कर्मीणो ना प्रवेदयन्ति रागात्
तेन आतुराः क्षीण-लोकः च्यवन्ते"
"अज्ञान के अँधेरे में गहरे, ये मूर्ख सोचते हैं, 'हम लक्ष्य तक पहुँच गए हैं'. कर्मकांडी धर्मों से जुड़े होने के कारण वे सत्य को समझने में विफल रहते हैं. उनकी धर्मपरायणता समाप्त हो जाने के बाद वे बार-बार जन्म और मृत्यु की स्थिति में गिर जाते हैं."
