**हिंदी अनुवाद:**
"हे मेरे प्रिय भगवान, मुझे इसलिये तत्त्व में विलीन होने के वरदान की इच्छा नहीं है जिसमें आपके कमल चरणों के अमृत पेय का अस्तित्व नहीं है। मैं कम से कम दस लाख कानों के वरदान चाहता हूँ जिससे मैं आपके परम भक्तों के मुख से आपके कमल चरणों के गुणों के बारे में सुन सकूँ।"
श्रीमद् भागवतम् (5.12.13) में अवधूत भरत राहुगण से इस प्रकार कहते हैं:
यत्रोत्तमश्लोक-गुणानुवाद:
प्रस्तूयते ग्राम्य-कथा-विघात:
निषेव्यमाणो 'नुदिनं मुमुक्षोर्
मतिं सतीं यच्छति वासुदेवे
"पवित्र भक्तों की सभा में भौतिक विषयों जैसे राजनीति और समाजशास्त्र पर चर्चा करने का कोई प्रश्न ही नहीं होता है। पवित्र भक्तों की सभा में केवल परम भगवान के गुणों, रूपों और लीलाओं पर चर्चा होती है। उन्हें पूरे ध्यान से स्तुति और पूजा जाता है। पवित्र भक्तों के संग में, ऐसे विषयों को लगातार श्रद्धापूर्वक सुनने से, यहाँ तक कि एक व्यक्ति जो पूर्ण सत्य के अस्तित्व में विलीन होना चाहता है, वह इस विचार को त्याग देता है और धीरे-धीरे वासुदेव की सेवा से जुड़ जाता है।"
पवित्र राजा मुचुकुंद श्रीमद् भागवतम् (10.51.53) में भगवान कृष्ण से इस प्रकार प्रार्थना करते हैं:
भवपवर्गो भ्रमतो यदा भवेज्
जनस्य तर्हि अच्युत सत्-समागम:
सत्संगमो यर्हि तदैव सदगौ
परावरेणे त्वयि जायते मति:
"हे अच्युत, जब भटकती आत्मा का भौतिक जीवन समाप्त हो जाता है, तो वह आपके भक्तों की संगति प्राप्त कर सकता है। और जब वह उनके साथ जुड़ता है, तो उसमें आपके प्रति भक्ति जागृत होती है, जो भक्तों का लक्ष्य और सभी कारणों और उनके प्रभावों के स्वामी हैं।"
श्रीमद् भागवतम् (6.11.27) में वृत्र परम भगवान से निम्नलिखित प्रार्थना करता है:
ममोत्तमश्लोक-जनेषु साख्यं
संसार-चक्रे भ्रमताः स्व-कर्माभि:
त्वन्मयात्मत्मज-दार-गेहेष्व
आसक्त-चित्तस्य ना नाथ भूयात
"हे मेरे स्वामी, मेरे स्वामी, मैं अपने फलित कार्यों के कारण पूरे भौतिक संसार में भटक रहा हूँ। इसलिए मैं आपके पवित्र और प्रबुद्ध भक्तों के साथ केवल दोस्ती चाहता हूँ। आपकी बाहरी ऊर्जा के जादू से मेरे शरीर, पत्नी, बच्चों और घर से मेरा लगाव जारी है, लेकिन मैं अब उनसे जुड़ा नहीं रहना चाहता। मेरे मन को, मेरी चेतना को और मेरे पास जो कुछ भी है वह केवल आपसे जुड़ा रहे।"
श्रीमद् भागवतम् (3.25.25) में भगवान कपिल अपनी माँ देवहूति से इस प्रकार कहते हैं:
सतां प्रसंगान मम वीर्य-संविदो
भवन्ति हृत्-कर्ण-रसायना: कथाः
तज्जोषणाद आश्र अपवर्गवर्तमनि
श्रद्धा रतिर भक्तिर अनुक्रमीष्यति
"पवित्र भक्तों की संगति में, परम भगवान के लीलाओं और कार्यों की चर्चा कान और हृदय को बहुत सुखद और संतुष्टि देने वाली होती है। ऐसे ज्ञान को विकसित करने से व्यक्ति धीरे-धीरे मुक्ति के मार्ग पर उन्नत हो जाता है, और उसके बाद उसे मुक्त कर दिया जाता है, और उसका आकर्षण स्थिर हो जाता है। फिर वास्तविक भक्ति और भक्ति सेवा शुरू होती है।"
श्रीमद् भागवतम् (1.2.14 और 16-18) में श्री सूत गोस्वामी शौनक के नेतृत्व वाले ऋषियों से इस प्रकार कहते हैं:
तस्मात् एकेन मनसा
भगवान् सात्वतां पतिः
श्रुतव्यः कीर्तितव्यश च
ध्येयः पूज्यश च नित्यदा
शुश्रूषो: श्रद्धाधनास्य
वासुदेव-कथा-रुचिः
स्यान महत्-सेवया विप्राः
पुण्य-तीर्थ-निषेवणात्
शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः
पुण्य-श्रवण-कीर्तनः
हृदय अन्तस्थो ह्यभद्राणि
विधुनोति सुहृत् सतां
नष्ट-प्रायेषु अभद्रेषु
नित्यं भागवत-सेवया
भगवति उत्तम-श्लोके
भक्तिर भवति नैष्ठिकी
"इसलिए एकाग्रचित्त से भगवान सात्वतों के स्वामी है। उसे सुना जाना चाहिए, उसे कीर्तन करना चाहिए, उसे ध्यान करना चाहिए और उसे हमेशा पूजना चाहिए। श्रवण और विश्वास के साथ वासुदेव की कथाओं में रूचि होती है। हे विप्र, महान व्यक्ति की सेवा से और पवित्र तीर्थ स्थलों के दर्शन से होती है। अपने बारे में कथाएँ सुनने वाले कृष्ण पवित्र सुनने और कीर्तन करने वाले होते हैं। जो हमारे हृदय में स्थित है वह अशुभ चीज़ों को नष्ट कर देता है और पवित्र लोगों का मित्र होता है। पवित्र भक्तों की निरंतर सेवा से अशुभ चीज़ों के नष्ट हो जाने पर भगवान उत्तमश्लोक में भक्ति अटल हो जाती है।"
इसलिए एकाग्रचित्त होकर भगवान के व्यक्तित्व के बारे में लगातार सुनना चाहिए, उनकी महिमा का गुणगान करना चाहिए, उन्हें याद रखना चाहिए और उनकी उपासना करनी चाहिए, जो भक्तों के रक्षक हैं। हे द्विजों, उन भक्तों की सेवा करने से जो सभी विकारों से मुक्त हैं, महान सेवा की जाती है। ऐसी सेवा से, वाशुदेव के संदेशों को सुनने की अभिरुचि प्राप्त होती है। श्रीकृष्ण, भगवान का व्यक्तित्व, जो हर किसी के हृदय में परमात्मा [अतिआत्मा] हैं और सच्चे भक्त के उपकारक हैं, भगवान के संदेशों को सुनने की इच्छा विकसित करने वाले भक्त के हृदय से भौतिक सुख की इच्छा को दूर करते हैं, जो स्वयं में सदगुणी होते हैं जब ठीक से सुने और जपे जाते हैं। भागवतम् पर कक्षाओं में नियमित रूप से उपस्थित रहने और शुद्ध भक्त की सेवा करने से, जो कुछ भी हृदय के लिए कष्टदायक है, लगभग पूरी तरह से नष्ट हो जाता है, और भगवान के व्यक्तित्व के लिए प्रेममयी सेवा, जिनकी प्रशंसा पारलौकिक गीतों से की जाती है, एक अपरिवर्तनीय तथ्य के रूप में स्थापित होती है।
