श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 239
 
 
श्लोक  2.1.239 
এতেকে ভজহ কৃষ্ণ সাধু-সঙ্গ করি’
মনে চিন্ত কৃষ্ণ মাতা, মুখে বল ’হরি’
एतेके भजह कृष्ण साधु-सङ्ग करि’
मने चिन्त कृष्ण माता, मुखे बल ’हरि’
 
 
अनुवाद
"इसलिए, हे माँ, भक्तों की संगति में कृष्ण की पूजा करो। कृष्ण का चिंतन करो और हरि नाम का जप करो।
 
“Therefore, O Mother, worship Krishna in the company of devotees. Think of Krishna and chant the name Hari.
तात्पर्य
इसलिए, हे माता, हमेशा भक्तों की संगति में कृष्ण की पूजा करो और अपने मुँह से हरि के नाम का जाप करते हुए अपने दिल में कृष्ण को याद रखो। यदि तुम भक्तों की संगति छोड़ देती हो, या यदि तुम किसी अभक्त के निर्देशन में कृष्ण की पूजा करने का प्रयास करती हो, तो तुम्हारे लिए कृष्ण की सेवा प्राप्त करने की कोई संभावना नहीं है।" भक्तों की संगति में कृष्ण के नाम का जाप करने की आवश्यकता का वर्णन श्रीमद भागवतम् (3.23.55) में किया गया है, जहाँ देवहूति कार्दम मुनि से इस प्रकार कहती हैं: "संसार के बंधन का मार्ग निश्चित रूप से इंद्रियों की तृप्ति के लिए मिलन होता है। लेकिन संत व्यक्ति के साथ किया जाने वाला वही प्रकार का मिलन, ज्ञान के बिना किए जाने पर भी, मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाता है।" श्रीमद भागवतम् (11.2.30) में निमि, विदेह के राजा, नौ योगेंद्रों से इस प्रकार कहते हैं: "इसलिए, हे पूर्ण रूप से पाप रहित, मैं तुमसे विनम्रतापूर्वक अनुरोध करता हूं कि कृपया बताएं कि सबसे बड़ा कल्याण क्या है? आखिरकार, जन्म और मृत्यु के इस संसार में भी शुद्ध भक्तों के साथ आधा क्षण बिताना भी किसी भी मनुष्य के लिए एक अनमोल खजाना है।" श्रीमद भागवतम् (3.25.20) में भगवान कपिल देवहूति से निम्नलिखित शब्द कहते हैं: "अति विद्वान लोग यह अच्छी तरह से जानते हैं कि भौतिक के लिए आसक्ति आत्मा की सबसे बड़ी उलझन है। लेकिन वही आसक्ति, जब आत्म-साक्षात व्यक्ति भक्तों के प्रति लगाई जाती है, तो मुक्ति का द्वार खोल देती है।" श्रीमद भागवतम् (4.22.19) में श्री सनत-कुमार महाराज पृथु से कहते हैं: "जब भक्तों का एक समूह होता है, उनकी चर्चाएँ, प्रश्न और उत्तर, वक्ता और श्रोता दोनों के लिए निश्चित हो जाते हैं। इस प्रकार ऐसी बैठक हर किसी की वास्तविक खुशी के लिए फायदेमंद होती है।" श्रीमद भागवतम् (4.29.40) में नारद मुनि श्री प्राचीनबर्ही से इस प्रकार कहते हैं: "मेरे प्रिय राजा, संत व्यक्तियों की उस सभा में, भगवान के महान व्यक्तित्व की महिमा को शुद्ध भक्तों द्वारा बड़े उत्सुकता के साथ सुना और गाया जाता है। यदि किसी को उनके अमृत के निरंतर प्रवाह को सुनने का मौका मिलता है, जो नदी की लहरों की तरह ही है, तो वह जीवन की आवश्यकताओं को भूल जाएगा- अर्थात् भूख और प्यास- और सभी प्रकार के डर, विलाप और भ्रम से प्रतिरक्षित हो जाएगा।" श्रीमद भागवतम् (4.30.33) में प्रचेता भगवान से निम्नलिखित प्रार्थना करते हैं: "प्रिय भगवान, जब तक हमें अपने भौतिक संदूषण के कारण इस भौतिक दुनिया में रहना पड़ेगा और एक प्रकार से दूसरे प्रकार के शरीर में भटकना पड़ेगा और एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर भटकना पड़ेगा, हम प्रार्थना करते हैं कि हम उन लोगों से जुड़ें जो आपके मनोरंजन पर चर्चा करने में लगे हुए हैं। हम जीवन भर, विभिन्न शारीरिक रूपों में और विभिन्न ग्रहों पर इस वरदान के लिए प्रार्थना करते हैं।" श्रीमद भागवतम् (2.2.36) में श्री शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित से निम्नलिखित शब्द कहते हैं: "इसलिए, हे राजा, यह आवश्यक है कि प्रत्येक मनुष्य भगवान के बारे में सुने, उनका महिमामंडन करे और उन्हें याद रखे, हमेशा और हर जगह।" श्रीमद भागवतम् (4.20.24) में महाराज पृथु वैकुण्ठ के भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करते हैं: "हे नाथ, मुझे वह भी कहीं नहीं चाहिए, जहाँ तुम्हारे चरण कमल का अमृत नहीं हो। महानतम आंतरिक हृदय से मुँह से निकला, मेरे लिए यही वर है कि तुम मुझे लाखों कान प्रदान करो।"

**हिंदी अनुवाद:**

"हे मेरे प्रिय भगवान, मुझे इसलिये तत्त्व में विलीन होने के वरदान की इच्छा नहीं है जिसमें आपके कमल चरणों के अमृत पेय का अस्तित्व नहीं है। मैं कम से कम दस लाख कानों के वरदान चाहता हूँ जिससे मैं आपके परम भक्तों के मुख से आपके कमल चरणों के गुणों के बारे में सुन सकूँ।"

श्रीमद् भागवतम् (5.12.13) में अवधूत भरत राहुगण से इस प्रकार कहते हैं:

यत्रोत्तमश्लोक-गुणानुवाद:

प्रस्तूयते ग्राम्य-कथा-विघात:

निषेव्यमाणो 'नुदिनं मुमुक्षोर्

मतिं सतीं यच्छति वासुदेवे

"पवित्र भक्तों की सभा में भौतिक विषयों जैसे राजनीति और समाजशास्त्र पर चर्चा करने का कोई प्रश्न ही नहीं होता है। पवित्र भक्तों की सभा में केवल परम भगवान के गुणों, रूपों और लीलाओं पर चर्चा होती है। उन्हें पूरे ध्यान से स्तुति और पूजा जाता है। पवित्र भक्तों के संग में, ऐसे विषयों को लगातार श्रद्धापूर्वक सुनने से, यहाँ तक कि एक व्यक्ति जो पूर्ण सत्य के अस्तित्व में विलीन होना चाहता है, वह इस विचार को त्याग देता है और धीरे-धीरे वासुदेव की सेवा से जुड़ जाता है।"

पवित्र राजा मुचुकुंद श्रीमद् भागवतम् (10.51.53) में भगवान कृष्ण से इस प्रकार प्रार्थना करते हैं:

भवपवर्गो भ्रमतो यदा भवेज्

जनस्य तर्हि अच्युत सत्-समागम:

सत्संगमो यर्हि तदैव सदगौ

परावरेणे त्वयि जायते मति:

"हे अच्युत, जब भटकती आत्मा का भौतिक जीवन समाप्त हो जाता है, तो वह आपके भक्तों की संगति प्राप्त कर सकता है। और जब वह उनके साथ जुड़ता है, तो उसमें आपके प्रति भक्ति जागृत होती है, जो भक्तों का लक्ष्य और सभी कारणों और उनके प्रभावों के स्वामी हैं।"

श्रीमद् भागवतम् (6.11.27) में वृत्र परम भगवान से निम्नलिखित प्रार्थना करता है:

ममोत्तमश्लोक-जनेषु साख्यं

संसार-चक्रे भ्रमताः स्व-कर्माभि:

त्वन्मयात्मत्मज-दार-गेहेष्व

आसक्त-चित्तस्य ना नाथ भूयात

"हे मेरे स्वामी, मेरे स्वामी, मैं अपने फलित कार्यों के कारण पूरे भौतिक संसार में भटक रहा हूँ। इसलिए मैं आपके पवित्र और प्रबुद्ध भक्तों के साथ केवल दोस्ती चाहता हूँ। आपकी बाहरी ऊर्जा के जादू से मेरे शरीर, पत्नी, बच्चों और घर से मेरा लगाव जारी है, लेकिन मैं अब उनसे जुड़ा नहीं रहना चाहता। मेरे मन को, मेरी चेतना को और मेरे पास जो कुछ भी है वह केवल आपसे जुड़ा रहे।"

श्रीमद् भागवतम् (3.25.25) में भगवान कपिल अपनी माँ देवहूति से इस प्रकार कहते हैं:

सतां प्रसंगान मम वीर्य-संविदो

भवन्ति हृत्-कर्ण-रसायना: कथाः

तज्जोषणाद आश्र अपवर्गवर्तमनि

श्रद्धा रतिर भक्तिर अनुक्रमीष्यति

"पवित्र भक्तों की संगति में, परम भगवान के लीलाओं और कार्यों की चर्चा कान और हृदय को बहुत सुखद और संतुष्टि देने वाली होती है। ऐसे ज्ञान को विकसित करने से व्यक्ति धीरे-धीरे मुक्ति के मार्ग पर उन्नत हो जाता है, और उसके बाद उसे मुक्त कर दिया जाता है, और उसका आकर्षण स्थिर हो जाता है। फिर वास्तविक भक्ति और भक्ति सेवा शुरू होती है।"

श्रीमद् भागवतम् (1.2.14 और 16-18) में श्री सूत गोस्वामी शौनक के नेतृत्व वाले ऋषियों से इस प्रकार कहते हैं:

तस्मात् एकेन मनसा

भगवान् सात्वतां पतिः

श्रुतव्यः कीर्तितव्यश च

ध्येयः पूज्यश च नित्यदा

शुश्रूषो: श्रद्धाधनास्य

वासुदेव-कथा-रुचिः

स्यान महत्-सेवया विप्राः

पुण्य-तीर्थ-निषेवणात्

शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः

पुण्य-श्रवण-कीर्तनः

हृदय अन्तस्थो ह्यभद्राणि

विधुनोति सुहृत् सतां

नष्ट-प्रायेषु अभद्रेषु

नित्यं भागवत-सेवया

भगवति उत्तम-श्लोके

भक्तिर भवति नैष्ठिकी

"इसलिए एकाग्रचित्त से भगवान सात्वतों के स्वामी है। उसे सुना जाना चाहिए, उसे कीर्तन करना चाहिए, उसे ध्यान करना चाहिए और उसे हमेशा पूजना चाहिए। श्रवण और विश्वास के साथ वासुदेव की कथाओं में रूचि होती है। हे विप्र, महान व्यक्ति की सेवा से और पवित्र तीर्थ स्थलों के दर्शन से होती है। अपने बारे में कथाएँ सुनने वाले कृष्ण पवित्र सुनने और कीर्तन करने वाले होते हैं। जो हमारे हृदय में स्थित है वह अशुभ चीज़ों को नष्ट कर देता है और पवित्र लोगों का मित्र होता है। पवित्र भक्तों की निरंतर सेवा से अशुभ चीज़ों के नष्ट हो जाने पर भगवान उत्तमश्लोक में भक्ति अटल हो जाती है।"

इसलिए एकाग्रचित्त होकर भगवान के व्यक्तित्व के बारे में लगातार सुनना चाहिए, उनकी महिमा का गुणगान करना चाहिए, उन्हें याद रखना चाहिए और उनकी उपासना करनी चाहिए, जो भक्तों के रक्षक हैं। हे द्विजों, उन भक्तों की सेवा करने से जो सभी विकारों से मुक्त हैं, महान सेवा की जाती है। ऐसी सेवा से, वाशुदेव के संदेशों को सुनने की अभिरुचि प्राप्त होती है। श्रीकृष्ण, भगवान का व्यक्तित्व, जो हर किसी के हृदय में परमात्मा [अतिआत्मा] हैं और सच्चे भक्त के उपकारक हैं, भगवान के संदेशों को सुनने की इच्छा विकसित करने वाले भक्त के हृदय से भौतिक सुख की इच्छा को दूर करते हैं, जो स्वयं में सदगुणी होते हैं जब ठीक से सुने और जपे जाते हैं। भागवतम् पर कक्षाओं में नियमित रूप से उपस्थित रहने और शुद्ध भक्त की सेवा करने से, जो कुछ भी हृदय के लिए कष्टदायक है, लगभग पूरी तरह से नष्ट हो जाता है, और भगवान के व्यक्तित्व के लिए प्रेममयी सेवा, जिनकी प्रशंसा पारलौकिक गीतों से की जाती है, एक अपरिवर्तनीय तथ्य के रूप में स्थापित होती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)