श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 236
 
 
श्लोक  2.1.236 
যদ্য্ অসদ্ভিঃ পথি পুনঃ শিশ্নোদর-কৃতোদ্যমৈ
ঃআস্থিতো রমতে জন্তুস্ তমো বিশতি পূর্ববত্
यद्य् असद्भिः पथि पुनः शिश्नोदर-कृतोद्यमै
ःआस्थितो रमते जन्तुस् तमो विशति पूर्ववत्
 
 
अनुवाद
“अतः यदि जीवात्मा पुनः अधर्म के मार्ग पर चलता है, तथा काम-भोग और तृप्ति में लगे हुए विषय-चित्त वाले लोगों के प्रभाव में आ जाता है, तो वह पुनः पहले की भाँति नरक में जाता है।
 
“Therefore, if the soul again follows the path of unrighteousness and comes under the influence of sensual minds engaged in sexual pleasure and gratification, it again goes to hell as before.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)