माया-पापे वाक्यांश का तात्पर्य या तो माया के प्रभाव के कारण कृष्ण को भूल जाना है या कृष्ण के प्रति घृणा के माध्यम से संचित पापों के समुद्र से है।
बेईमान गैर-भक्तों की दुष्ट प्रवृत्ति कृष्ण की सेवा को त्यागना और बाहरी इच्छा, कर्म या ज्ञान के लिए प्रयास करना है। वे आध्यात्मिक वस्तुओं को सीमित और तुच्छ मानते हैं, और उन्हें अपने कामुक ज्ञान से मापते हुए भौतिकवादी बन जाते हैं। वे जीव जो बेहद दुर्भाग्यशाली हैं और कृष्ण की सेवा के लिए स्वाद से रहित हैं, माया द्वारा बनाए गए भौतिक अस्तित्व के सागर में डूबकर मृत्यु को प्राप्त करते हैं। भौतिक इंद्रियों के माध्यम से सब कुछ मापने का प्रयास केवल भगवान के प्रति घृणा और विस्मृति है। भौतिक ज्ञान ऐसी वातानुकूलित आत्माओं को धर्म और अधर्म की लहरों में बहा ले जाता है और अंततः उन्हें भौतिक अस्तित्व के गहरे पानी में डुबो कर जन्म और मृत्यु की पीड़ा भोगने के लिए मजबूर करता है।
श्रीमद भागवत (11.26.3) में भगवान कृष्ण उद्धव से इस प्रकार कहते हैं:
संगं न कुर्यादसतां
शिश्नोदर-तृपां क्वचित
तस्यानुगं तमसांध
पतत्यंधानुगान्धवत्
पेट। उनके पीछे चलने से व्यक्ति अंधेरे के सबसे गहरे गड्ढे में गिर जाता है, जैसे एक अंधा व्यक्ति जो दूसरे अंधे का अनुसरण करता है।"
