श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 235
 
 
श्लोक  2.1.235 
অন্যথা না ভজে কৃষ্ণ, দুষ্ট-সঙ্গ করে
পুনঃ সেই-মত মাযা-পাপে ডুবি’ মরে
अन्यथा ना भजे कृष्ण, दुष्ट-सङ्ग करे
पुनः सेइ-मत माया-पापे डुबि’ मरे
 
 
अनुवाद
“लेकिन यदि वह कृष्ण की पूजा नहीं करता और बुरी संगति में पड़ जाता है, तो वह पुनः पाप कर्मों और मोह की गहराई में डूब जाता है।
 
“But if he does not worship Krishna and falls into bad company, he again sinks into the depths of sinful activities and attachment.
तात्पर्य
शब्द 'अन्यथा' का अर्थ है "दूसरी ओर", "इसके अतिरिक्त" या "इसके विपरीत"।

माया-पापे वाक्यांश का तात्पर्य या तो माया के प्रभाव के कारण कृष्ण को भूल जाना है या कृष्ण के प्रति घृणा के माध्यम से संचित पापों के समुद्र से है।

बेईमान गैर-भक्तों की दुष्ट प्रवृत्ति कृष्ण की सेवा को त्यागना और बाहरी इच्छा, कर्म या ज्ञान के लिए प्रयास करना है। वे आध्यात्मिक वस्तुओं को सीमित और तुच्छ मानते हैं, और उन्हें अपने कामुक ज्ञान से मापते हुए भौतिकवादी बन जाते हैं। वे जीव जो बेहद दुर्भाग्यशाली हैं और कृष्ण की सेवा के लिए स्वाद से रहित हैं, माया द्वारा बनाए गए भौतिक अस्तित्व के सागर में डूबकर मृत्यु को प्राप्त करते हैं। भौतिक इंद्रियों के माध्यम से सब कुछ मापने का प्रयास केवल भगवान के प्रति घृणा और विस्मृति है। भौतिक ज्ञान ऐसी वातानुकूलित आत्माओं को धर्म और अधर्म की लहरों में बहा ले जाता है और अंततः उन्हें भौतिक अस्तित्व के गहरे पानी में डुबो कर जन्म और मृत्यु की पीड़ा भोगने के लिए मजबूर करता है।

श्रीमद भागवत (11.26.3) में भगवान कृष्ण उद्धव से इस प्रकार कहते हैं:

संगं न कुर्यादसतां

शिश्नोदर-तृपां क्वचित

तस्यानुगं तमसांध

पतत्यंधानुगान्धवत्

पेट। उनके पीछे चलने से व्यक्ति अंधेरे के सबसे गहरे गड्ढे में गिर जाता है, जैसे एक अंधा व्यक्ति जो दूसरे अंधे का अनुसरण करता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)