श्री चैतन्य-चरितामृत (मध्य 20.117-118, 120) में कहा गया है: "कृष्ण को भूलकर, प्राणी अनादि काल से बाहरी रूप से आकर्षित होता रहा है। इसलिए भ्रामक शक्ति [माया] उसे अपने भौतिक अस्तित्व में सभी प्रकार के दुख देती है। भौतिक स्थिति में, प्राणी को कभी-कभी उच्च ग्रह प्रणालियों और भौतिक समृद्धि में उठाया जाता है और कभी-कभी नारकीय स्थिति में डुबोया जाता है। उसकी स्थिति बिल्कुल एक अपराधी की तरह होती है जिसे राजा पानी में डुबो कर दंड देता है और फिर उसे पानी से फिर से बाहर निकालता है। यदि सशर्त आत्मा संत-व्यक्तियों की दया से कृष्ण भावनामृत होती है, जो स्वेच्छा से शास्त्रीय आज्ञाओं का उपदेश देते हैं और उसे कृष्ण भावनामृत होने में मदद करते हैं, तो सशर्त आत्मा माया के चंगुल से मुक्त हो जाती है, जो उसे छोड़ देती है।" चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.12-15, 24-25, 33, 35, 37, 41) में आगे कहा गया है: "हमेशा मुक्त भक्तों के अलावा, कुछ सशर्त आत्माएं होती हैं जो हमेशा भगवान की सेवा से विमुख रहती हैं। वे इस भौतिक दुनिया में सदा के लिए बंधे रहते हैं और नारकीय परिस्थितियों में विभिन्न शारीरिक रूपों द्वारा उत्पन्न भौतिक क्लेशों के अधीन होते हैं। कृष्ण भावनामृत के प्रति विरोधी होने के कारण, सशर्त आत्मा को बाहरी शक्ति माया की चुड़ैल द्वारा दंडित किया जाता है। इस प्रकार वह तीन गुना दुखों को भुगतने के लिए तैयार है - शरीर और दिमाग के कारण होने वाले दुख, अन्य जीवित प्राणियों के शत्रुतापूर्ण व्यवहार और देवताओं द्वारा होने वाली प्राकृतिक गड़बड़ी। इस तरह सशर्त आत्मा कामुक इच्छाओं की दास बन जाती है, और जब ये पूरी नहीं होती हैं, तो वह क्रोध की दास बन जाती है और बाहरी ऊर्जा माया से लात खाना जारी रखती है। पूरे ब्रह्मांड में भटकते और भटकते हुए, उसे संयोग से एक भक्त चिकित्सक का संग मिल सकता है, जिसके निर्देश और भजन बाहरी ऊर्जा की चुड़ैल को भगा देते हैं। इस प्रकार सशर्त आत्मा भगवान कृष्ण की भक्ति सेवा के संपर्क में आ जाती है, और इस तरह वह भगवान के करीब और करीब पहुँच सकता है। जीवित प्राणी माया की जंजीर से इसलिए बंधा हुआ है क्योंकि वह भूल गया है कि वह शाश्वत रूप से कृष्ण का सेवक है। यदि सशर्त आत्मा भगवान की सेवा में संलग्न होती है और साथ ही साथ अपने आध्यात्मिक गुरु के आदेशों का पालन करती है और उनकी सेवा करती है, तो वह माया के चंगुल से निकल सकती है और कृष्ण के चरण कमलों में आश्रय के योग्य बन सकती है। यदि वह गंभीरता और ईमानदारी से कहता है तो माया के चंगुल से तुरंत मुक्त हो जाता है, 'मेरे प्रिय भगवान कृष्ण, हालाँकि मैं आपको भौतिक दुनिया में इतने सालों से भूल गया हूँ, आज मैं आपके सामने समर्पण कर रहा हूँ। मैं आपका ईमानदार और गंभीर सेवक हूँ। कृपया मुझे अपनी सेवा में संलग्न करें।' बुरे संग के कारण, जीवित इकाई भौतिक सुख, मुक्ति या भगवान के निराकार दृष्टिकोण में विलय की इच्छा करता है, या वह भौतिक शक्ति के लिए रहस्यमय योग में संलग्न होता है। यदि ऐसा व्यक्ति वास्तव में बुद्धिमान बनता है, तो वह भगवान श्री कृष्ण की तीव्र भक्ति सेवा में खुद को व्यस्त करके कृष्ण भावनामृत को लेता है। यदि जो लोग भौतिक भोग की इच्छा रखते हैं या परम सत्य के अस्तित्व में विलय करते हैं, वे भगवान की पारलौकिक प्रेममय सेवा में संलग्न होते हैं, तो वे तुरंत कृष्ण के चरण-कमलों में आश्रय प्राप्त करेंगे, हालाँकि उन्होंने इसके लिए नहीं पूछा था। इसलिए कृष्ण बहुत दयालु हैं। जब कोई इंद्रियों की संतुष्टि के लिए भगवान कृष्ण की भक्ति सेवा में संलग्न होता है और इसके बजाय कृष्ण की सेवा करने का स्वाद प्राप्त करता है, तो वह अपनी भौतिक इच्छाओं को त्याग देता है और स्वेच्छा से खुद को कृष्ण के शाश्वत सेवक के रूप में अर्पित कर देता है।
