श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 232
 
 
श्लोक  2.1.232 
মূর্ছাগত হয ক্ষণে, ক্ষণে কান্দে শ্বাসে
কহিতে না পারে, দুঃখ-সাগরেতে ভাসে
मूर्छागत हय क्षणे, क्षणे कान्दे श्वासे
कहिते ना पारे, दुःख-सागरेते भासे
 
 
अनुवाद
कभी वह बेहोश हो जाता है, कभी रोता है, कभी आहें भरता है। कुछ भी कहने में असमर्थ, वह दुख के सागर में तैरता रहता है।
 
Sometimes he faints, sometimes he cries, sometimes he sighs. Unable to say anything, he floats in an ocean of sorrow.
तात्पर्य
शब्द श्वासे का अर्थ है "वह साँस लेता है और छोड़ता है।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)