श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 227
 
 
श्लोक  2.1.227 
হেন কর’ কৃষ্ণ, এবে দাস্য-যোগ
দিযাচরণে রাখহ দাসী-নন্দন করিযা
हेन कर’ कृष्ण, एबे दास्य-योग
दियाचरणे राखह दासी-नन्दन करिया
 
 
अनुवाद
हे कृष्ण, कृपया मुझे अपनी सेवा से अनुग्रहित करें और मुझे अपनी दासी के पुत्र के रूप में अपने चरण कमलों में रखें।
 
O Krishna, please bless me with Your service and keep me at Your lotus feet as the son of Your maidservant.
तात्पर्य
जैसे गृहस्थ भक्त की दासी का पुत्र अपने जन्म के समय से भगवान की सेवा के सिवाय कुछ नहीं जानता, उसी प्रकार आप मुझे भी हमेशा अपनी अविभक्त सेवा में व्यस्त रखें, मुझे अपनी आश्रित दासी का पुत्र समझ कर स्वीकार करें। तब मैं आपकी निःस्वार्थ सेवा में निरंतर संलग्न रह सकता हूँ और सेवा के बहाने कभी भी आप भुलाकर स्वामी नहीं बन जाऊँगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)