श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 226
 
 
श्लोक  2.1.226 
সে দুঃখ-বিপদ্ প্রভু, রহু বারে বার
যদি তোর স্মৃতি থাকে সর্ব-বেদ-সার
से दुःख-विपद् प्रभु, रहु बारे बार
यदि तोर स्मृति थाके सर्व-वेद-सार
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, जब तक आपका स्मरण, जो सभी वेदों का सार है, अक्षुण्ण रहेगा, तब तक ये दुख और खतरे बार-बार आते रहेंगे।
 
O Lord, as long as Your remembrance, which is the essence of all the Vedas, remains intact, these sorrows and dangers will keep recurring.
तात्पर्य
सभी वेदों का सार है कि अगर कोई जीव-जन्तु निरंतर कृष्ण को याद रखता है, तो उसे किसी भी प्रकार की अशुभता का सामना नहीं करना पड़ता। हे प्रभु, अपने पिछले कुकृत्यों के कारण इस दुनिया में जीवन की दयनीय स्थिति में गिरने के बाद भी, अगर मेरे हृदय में आपका स्मरण लगातार जागृत रहता है, तो यह मेरे लिए सबसे शुभ होगा। भौतिकवादी जीवों को पदार्थ में अपने अवशोषण से मुक्त करने और उनके मन को अपनी ओर मोड़ने के लिए, प्रभु ने उन्हें असंख्य त्रिगुणात्मक कष्ट और दुख प्रदान किए हैं, जो बाहरी दृष्टिकोण से सजा प्रतीत होते हैं लेकिन आंतरिक दृष्टिकोण से महान करुणा के प्रमाण हैं। हर कदम पर हम अपने कार्यों को करने वाले के रूप में गर्व से पहचान करने के झूठे अहंकार से भ्रमित होते हैं, और हम लगातार काम-वासना में लिप्त रहते हैं; लेकिन भगवान की भ्रमित करने वाली मायावी ऊर्जा हमारे सभी भौतिक भोगों को दुखों के सागर में बदल देती है। फिर भी उत्पीड़न, दंड और त्रिगुणात्मक दुखों से पीड़ित होने के भयानक नुस्खे के पीछे, प्रभु की अतुलनीय दया फल्गु नदी की तरह बहती है, जो भूमिगत बहती है। जब हम इस भौतिक दुनिया में बाधाओं, अशांति, खतरों और दुर्भाग्य जैसी असुविधाओं की असंख्य किस्मों का सामना करते हैं, परिणामस्वरूप जब हमारे काम-वासना में बाधा आती है, तो हम अपनी स्वतंत्रता के दुरुपयोग की ईश्वर विहीनता के रूप में निंदा करते हैं, जो कि हमारे त्रिगुणात्मक दुखों का मूल कारण है, और हम साथ-साथ पदार्थ में अवशोषण के लिए अरुचि विकसित करते हैं। उस समय हम अपने शाश्वत लाभ और भौतिक भोग से मुक्ति की खोज करने का प्रयास करते हैं, जो दुख से भरा है, और हम अपने शाश्वत स्वामी, मधुसूदन, पापों और विपत्तियों से मुक्तिदाता के चरणों की असीम दया का स्मरण करते हैं। इससे हमें जो सबक मिलता है वह यह है कि भौतिक प्रकृति का आनंद लेने या उस पर आधिपत्य करने का प्रयास करना एक अत्यंत मूर्खतापूर्ण प्रस्ताव है। कृष्ण का स्मरण, जो कि सच्चिदानंद-विग्रह हैं और सभी कारणों का कारण हैं, और स्मरण के आधार पर उनकी सेवा में व्यस्तता ही हमारा शाश्वत धन और परम लाभ का स्रोत है। श्रीमद भागवतम् (2.1.6) में श्री शुकादेव गोस्वामी महाराज परीक्षित से इस प्रकार कहते हैं:

एतावान् सांख्य-योगाभ्यां

स्व-धर्म-परिनिष्ठया

जन्म-लाभः परः पुंसाम्

अन्ते नारायण-स्मृतिः

"मानव जीवन की सर्वोच्च पूर्णता, या तो पदार्थ और आत्मा के पूर्ण ज्ञान से, रहस्यमय शक्तियों के अभ्यास से या व्यावसायिक कर्तव्य के पूर्ण निर्वहन से प्राप्त की जाती है, जीवन के अंत में भगवान के व्यक्तित्व को याद करना है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)