सत्कथामृतजीवनानाम्, कीर्तनीयकथयादिभिर्नित्यं नाम्नाम्।
कृष्णप्रेमलतापवित्राणाम, वत्सलानां स्मृतिमात्र एव।
गाढनिर्विषयाणाम्, अंग तान्यतिमनागपि हृदि भवन्ति तानि॥
कृष्ण के परात्पर गुणों की गाथा से रिक्त तथा जीव मात्र के विकारी गुणों के गान से असभ्य आचार से पूर्ण स्थान; जहाँ वैकुण्ठ से पवित्र भक्तों का आगमन नहीं हुआ और कृष्ण के नाम, रूप, गुण, लीला आदि का-जो कृष्ण से भिन्न नहीं है-गान नहीं हुआ; जहाँ परमेश्वर की लीला की अभिव्यक्ति ना हो; और जहाँ प्रभु के हर्ष हेतु उत्सव नहीं मनाये जाते-ऐसे स्थलों में, यद्यपि उनमें इन्द्र के धाम अमरावती जितना ही ऐश्वर्य हो, मैं उनकी कामना नहीं करता। यह उक्ति-त्रिदश-पूः आकाश-पुष्पायते अर्थात, स्वर्ग-लोक की प्राप्ति को भ्रम के समान समझना-केवल उनके लिए ही संभव है जो अदृश्य परमात्मा अधोक्षज की आराधना को सिद्ध कर चुके हैं; अन्यथा, अर्थात जिसका मन बाह्य जगत में प्रवृत्ति से रहित हो। चूँकि भौतिकवादियों की इच्छा इन्द्रिय तृप्ति की ही होती है, अतः उनमें वैकुण्ठ अथवा विष्णु भगवान के स्मरण की इच्छा नहीं हो सती। अतः वे स्वार्थ रहित कर्मों का आधार, अन्य कामनाओं से रहित विष्णु भक्ति की उपेक्षा करते हुए, इन्द्रिय तृप्ति के लिए श्रेष्ठ उत्तम स्वर्ग लोक का गान करते हैं।
भारत भू में मानव जन्म की श्रेष्ठता, जो हरि के चरण कमलों की सेवा हेतु अनुकूल है, तथा उसी भारत भूमि में मानव जन्म द्वारा पाँचवें पुरुषार्थ की सिद्धि हेतु अतिशय उपयोगिता, जो पवित्र स्थानों से पूर्ण है-जहाँ भगवान हरि ने अवतार लिया है और अपनी लीलाएँ की हैं-और जो स्वर्ग लोक से श्रेष्ठ है जहाँ हरि के चरण कमलों का स्मरण नहीं होता है, भगवान शुकदेव गोस्वामी ने राजा परीक्षित से कहे निम्नलिखित श्लोक में देवतागण द्वारा प्रशंसा की गई है-(श्रीमद भागवत 5.19.24)[अगला श्लोक]
