श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 219
 
 
श्लोक  2.1.219 
এই কৃপা কর,—যেন তোমা না পাসরি
যেখানে-সেখানে কেনে না জন্মি, না মরি
एइ कृपा कर,—येन तोमा ना पासरि
येखाने-सेखाने केने ना जन्मि, ना मरि
 
 
अनुवाद
“मुझ पर दया करो ताकि मैं तुम्हें न भूलूँ, चाहे मैं कहीं भी जन्म लूं और मर जाऊं।
 
“Have mercy on me so that I do not forget you, no matter where I am born or die.
तात्पर्य
राजा कुलशेखर ने अपने मुकुंद-माला-स्तोत्र (5) में लिखा है:

नास्था धर्मे न वसु-निचये नैव कामोपभोगे

यद् भाव्यं तद् भवतु भगवान् पूर्व-कर्मानुरूपम्

एतत् प्रार्थ्यं मम बहु मतं जन्म-जन्मांतरेऽपि

त्वत्-पादाम्बोरूह-युग-गता निश्चला भक्तिर् अस्तु

“हे मेरे स्वामी! धर्म, धन-संग्रह और इंद्रिय-सुखों में मेरा कोई आसक्ति नहीं है। वे जैसा मेरे भाग्य में लिखा है, कर्मों के अनुसार स्वतः ही मुझे प्राप्त हो जाएँगे। लेकिन मैं माँगता हूँ एक वरदान, जन्म-जन्मों में मुझे आपके चरणों में दृढ़ भक्ति प्राप्त हो।”

श्रीमद् भागवतम् (10.14.30) में ब्रह्मा भगवान कृष्ण से प्रार्थना करते हैं:

तद् अस्तु मे नाथ स भूरी-भागो

भवेऽत्र वान्यत्र तु वा तिरश्चाम

येनाहम एकोऽपि भवाज-जनानां

भूत्वा निशेवे तव पाद-पल्लवम्

“हे मेरे स्वामी, मैं प्रार्थना करता हूँ कि मुझे इतना भाग्य मिले कि इस जन्म में ब्रह्मा के रूप में या किसी अन्य जन्म में या यहाँ तक कि पशु-योनियों में भी मैं आपके भक्तों में गिना जाऊँ। मैं प्रार्थना करता हूँ कि मैं जहाँ भी होऊँ, आपके चरणों की भक्ति करूँ।”

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)