तावद् भयं द्रविण-देह-सुहृन्निमित्तं
शोकः स्पृहा परिभवो विपुळश्च लोभः
तावन् ममेत्यसदवग्रह आर्तिमूलं
यावन्न ते ङ्घ्रिमभयं प्रवृणीत लोकः
“हे मेरे प्रभु, संसार के लोग सभी भौतिक चिंताओं से परेशान हैं - वे हमेशा डरे रहते हैं। वे हमेशा धन, शरीर और दोस्तों की रक्षा करने की कोशिश करते हैं, वे विलाप और अवैध इच्छाओं और साज-सामान से भरे हुए हैं, और वे लालची रूप से अपनी समझ को 'मेरे' और 'मेरे' की अवधारणाओं पर आधारित करते हैं। जब तक वे आपके सुरक्षित कमल चरणों का आश्रय नहीं लेते, तब तक वे ऐसी चिंताओं से भरे रहते हैं।”
