श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  2.1.217 
তুমি-হেন কল্প-তরু-ঠাকুর ছাডিযা
ভুলিলাঙ অসত্-পথে প্রমত্ত হৈযা
तुमि-हेन कल्प-तरु-ठाकुर छाडिया
भुलिलाङ असत्-पथे प्रमत्त हैया
 
 
अनुवाद
“तुम्हारे जैसे कल्पवृक्ष को त्यागकर मैं पागल हो गया और पापमय जीवन अपनाने लगा।
 
“Having abandoned a wish-fulfilling tree like you, I went mad and started leading a sinful life.
तात्पर्य
इस पद के द्वितीय पंक्ति का विस्तार करने के लिए मैत्रेय और विदुर के बीच हुए संवाद में श्रीमद्भागवत (3.9.6) में नारायण के लिए ब्रह्मा के प्रार्थना का वर्णन करना चाहिए:

तावद् भयं द्रविण-देह-सुहृन्निमित्तं

शोकः स्पृहा परिभवो विपुळश्च लोभः

तावन् ममेत्यसदवग्रह आर्तिमूलं

यावन्न ते ङ्घ्रिमभयं प्रवृणीत लोकः

“हे मेरे प्रभु, संसार के लोग सभी भौतिक चिंताओं से परेशान हैं - वे हमेशा डरे रहते हैं। वे हमेशा धन, शरीर और दोस्तों की रक्षा करने की कोशिश करते हैं, वे विलाप और अवैध इच्छाओं और साज-सामान से भरे हुए हैं, और वे लालची रूप से अपनी समझ को 'मेरे' और 'मेरे' की अवधारणाओं पर आधारित करते हैं। जब तक वे आपके सुरक्षित कमल चरणों का आश्रय नहीं लेते, तब तक वे ऐसी चिंताओं से भरे रहते हैं।”

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)