श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 210
 
 
श्लोक  2.1.210 
তখনে সে স্মরিযা করে অনুতাপ
স্তুতি করে কৃষ্ণেরে ছাডিযা ঘন শ্বাস
तखने से स्मरिया करे अनुताप
स्तुति करे कृष्णेरे छाडिया घन श्वास
 
 
अनुवाद
"उस समय जीवात्मा अपने पिछले पाप कर्मों को याद करके पश्चाताप करता है। वह गहरी आह भरता है और कृष्ण से प्रार्थना करता है।
 
"At that time the soul remembers its past sinful deeds and repents. It sighs deeply and prays to Krishna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)