"भगवान ने कहा: जैसे बादलों का समुदाय वायु के शक्तिशाली प्रभाव को नहीं जानता है, वैसे ही भौतिकता में लिप्त व्यक्ति काल के शक्तिशाली बल को नहीं जानता है, जिसके द्वारा वह बहाया जा रहा है।"
"भौतिकवादी अत्यधिक पीड़ा और श्रम के साथ जिस भी चीज़ का उत्पादन तथाकथित सुख के लिए करता है, उसे सर्वोच्च व्यक्तित्व, काल कारक के रूप में, नष्ट कर देते हैं, और इसी कारण से शर्तबद्ध आत्मा विलाप करती है।"
"भ्रमित भौतिकवादी यह नहीं जानता कि उसका शरीर ही नश्वर है और उस शरीर से संबंधित घर, ज़मीन और धन का आकर्षण भी अस्थायी है। केवल अज्ञानता के कारण, वह सोचता है कि सब कुछ स्थायी है।"
"जीवित इकाई, वह जिस भी प्रजाति के जीवन में प्रकट होती है, उस प्रजाति में एक विशेष प्रकार की संतुष्टि पाती है, और वह कभी भी ऐसी स्थिति में स्थित होने के लिए प्रतिकूल नहीं होती है।"
"शर्तबद्ध जीवित इकाई अपने जीवन की अपनी विशेष प्रजातियों में संतुष्ट होती है; भ्रामक ऊर्जा के आवरण के प्रभाव से भ्रमित होकर, वह अपने शरीर को छोड़ने के लिए कम इच्छुक महसूस करती है, यहाँ तक कि नरक में भी, क्योंकि वह नारकीय आनंद में प्रसन्नता लेती है।"
"जीवन का स्तर से ऐसी संतुष्टि शरीर, पत्नी, घर, बच्चे, जानवर, धन और दोस्तों के लिए गहरी जड़ें जमाने के आकर्षण के कारण है। ऐसे जुड़ाव में, शर्तबद्ध आत्मा खुद को काफी परिपूर्ण समझती है।"
"हालाँकि वह हमेशा चिंता से जलती रहती है, लेकिन इस तरह का मूर्ख अपने तथाकथित परिवार और समाज को बनाए रखने के लिए हमेशा सभी प्रकार की शरारतपूर्ण गतिविधियों को एक ऐसी आशा के साथ करता रहता है जो कभी पूरी नहीं होने वाली है।"
"वह एक ऐसी महिला को दिल और इंद्रिय देता है, जो उसे माया से झूठा आकर्षित करती है। वह एकांत आलिंगन और उसके साथ बातें करने का आनंद लेता है, और वह छोटे बच्चों के मीठे शब्दों से मुग्ध हो जाता है।"
"लगाव रखने वाला गृहस्थ अपने पारिवारिक जीवन में बना रहता है, जो कूटनीति और राजनीति से भरा होता है। हमेशा दुख फैलाना और काम के सुख से नियंत्रित होना, वह अपने सभी दुखों की प्रतिक्रियाओं का प्रतिकार करने के लिए कार्य करता है, और अगर वह सफलतापूर्वक ऐसे दुखों का प्रतिकार कर सकता है, तो वह सोचता है कि वह खुश है।"
"वह इधर-उधर हिंसा करके पैसा हासिल करता है, और हालाँकि वह इसे अपने परिवार की सेवा में लगाता है, लेकिन वह खुद खरीदे गए भोजन का केवल एक छोटा सा हिस्सा खाता है, और वह उन लोगों के लिए नरक में जाता है जिनके लिए उसने ऐसे अनियमित तरीके से पैसा कमाया।"
"जब वह अपने व्यवसाय में असफल होता है, तो वह बार-बार खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करता है, लेकिन जब वह सभी प्रयासों में विफल हो जाता है और बर्बाद हो जाता है, तो वह अत्यधिक लालच के कारण दूसरों से पैसे प्राप्त करता है।"
"इस प्रकार, अपने परिवार के सदस्यों का भरण-पोषण करने में असफल, दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्ति सभी सुंदरता से रहित हो जाता है। वह हमेशा अपनी असफलता के बारे में सोचता है, बहुत गहराई से दुखी होता है।"
"उसे उनका भरण-पोषण करने में असमर्थ देखकर, उसकी पत्नी और अन्य उसके साथ पहले जैसा सम्मान नहीं करते हैं, जैसे कंजूस किसान अपने बूढ़े और घिसे-पिटे बैलों के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं करते हैं।"
"मूर्ख परिवार का व्यक्ति पारिवारिक जीवन के प्रति विमुख नहीं होता है, हालाँकि वह उन लोगों द्वारा बनाए रखा जाता है जिनका वह कभी भरण-पोषण करता था। बुढ़ापे के प्रभाव से विकृत, वह अंतिम मृत्यु से मिलने के लिए खुद को तैयार करता है।"
"इस प्रकार वह घर में एक पालतू कुत्ते की तरह ही रहता है और जो कुछ भी उसे लापरवाही से दिया जाता है वह खाता है। डिस्प्सीसिया और भूख न लगना जैसी कई बीमारियों से पीड़ित, वह केवल भोजन के बहुत छोटे टुकड़े खाता है, और वह एक अपाहिज बन जाता है, जो अब और काम नहीं कर सकता है।"
"उस रोगग्रस्त स्थिति में, भीतर से हवा के दबाव के कारण किसी की आंखें उभरी हुई होती हैं, और उसकी ग्रंथियाँ बलगम से भर जाती हैं। उसे सांस लेने में कठिनाई होती है, और साँस छोड़ने और साँस लेने पर वह घुरा-घुरा की तरह आवाज़ पैदा करता है, गले के अंदर खड़खड़ाहट होती है।"
"इस प्रकार वह मृत्यु के चंगुल में आ जाता है और लेट जाता है, उसके चारों ओर विलाप करने वाले मित्र और रिश्तेदार घेरे रहते हैं, और हालाँकि वह उनसे बात करना चाहता है, लेकिन वह अब ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि वह समय के नियंत्रण में है।
"इस प्रकार, वह व्यक्ति, जिसने अनियंत्रित इंद्रियों के साथ परिवार का भरण-पोषण करने में व्यस्त रहा है, अपने रिश्तेदारों को रोते हुए देखकर महान दुख में मर जाता है। वह अत्यंत दयनीय रूप से, महान दर्द में और चेतना के बिना मर जाता है।
"मृत्यु के समय, वह मृत्यु के देवता के दूतों को अपने सामने आते देखता है, उनकी आँखें क्रोध से भरी होती हैं, और महान भय में वह मल और मूत्र त्यागता है।
"जैसे एक अपराधी को राज्य के सिपाहियों द्वारा दंड के लिए गिरफ्तार किया जाता है, वैसे ही आपराधिक इंद्रिय सुख में लिप्त व्यक्ति को यमदूतों द्वारा इसी प्रकार गिरफ्तार किया जाता है, जो उसे मजबूत रस्सी से गर्दन से बाँधते हैं और उसके सूक्ष्म शरीर को ढँक देते हैं ताकि वह कठोर दंड भोग सके।
"यमराज के सिपाहियों द्वारा ले जाते समय, वह अभिभूत हो जाता है और उनके हाथों में काँपता है। सड़क से गुजरते समय उसे कुत्ते काटते हैं, और वह अपने जीवन की पापपूर्ण गतिविधियों को याद कर सकता है। इस तरह वह बहुत व्यथित होता है।
"चिलचिलाती धूप में, अपराधी को दोनों ओर जंगल की आग के साथ गर्म रेत की सड़कों से गुजरना पड़ता है। चलने में असमर्थता के कारण उसे सिपाहियों द्वारा पीठ पर कोड़े मारे जाते हैं, और वह भूख और प्यास से पीड़ित होता है, लेकिन दुर्भाग्यवश सड़क पर पीने का पानी, कोई आश्रय और आराम करने की कोई जगह नहीं होती है।
"यमराज के निवास के लिए उस सड़क से गुजरते समय, वह थकान से गिर जाता है, और कभी-कभी बेहोश हो जाता है, लेकिन उसे फिर से उठने के लिए मजबूर किया जाता है। इस तरह उसे बहुत जल्दी यमराज की उपस्थिति में लाया जाता है।
"इस प्रकार उसे दो या तीन क्षणों में निन्यानबे हजार योजन पार करने होते हैं, और फिर वह एक बार में उस यातनापूर्ण दंड में लग जाता है जो उसे भुगतना तय है।
"उसे जलती हुई लकड़ी के टुकड़ों के बीच में रखा जाता है, और उसके अंगों में आग लगा दी जाती है। कुछ मामलों में उसे अपना मांस खाने या दूसरों से खाने के लिए मजबूर किया जाता है।
"उसकी अंतड़ियों को नरक के कुत्तों और गिद्धों द्वारा निकाला जाता है, भले ही वह इसे देखने के लिए अभी भी जीवित हो, और उसे सांपों, बिच्छुओं, मच्छरों और अन्य जीवों द्वारा पीड़ा दी जाती है जो उसे काटते हैं।
"अगला उसका अंग हाथियों द्वारा काट दिया जाता है और फाड़ दिया जाता है। उसे पहाड़ियों से नीचे फेंक दिया जाता है, और उसे पानी में या किसी गुफा में भी कैद में रखा जाता है।
"जिन पुरुषों और महिलाओं का जीवन अवैध यौन जीवन में लिप्त होकर बनाया गया था, उन्हें तामिस्र, अंध-तामिस्र और रौरव नामक नरकों में कई प्रकार की दुखद परिस्थितियों में डाल दिया जाता है।
"भगवान कपिल ने जारी रखा: मेरी प्रिय माँ, यह कभी-कभी कहा जाता है कि हम इस ग्रह पर नरक या स्वर्ग का अनुभव करते हैं, क्योंकि नारकीय दंड कभी-कभी इस ग्रह पर भी दिखाई देते हैं।
"इस शरीर को छोड़ने के बाद, जो व्यक्ति पापपूर्ण गतिविधियों से अपना और अपने परिवार के सदस्यों का भरण-पोषण करता था, वह नारकीय जीवन जीता है, और उसके रिश्तेदार भी पीड़ित होते हैं।
"वर्तमान शरीर छोड़ने के बाद वह अकेले नरक के सबसे काले क्षेत्रों में जाता है, और दूसरे जीवित प्राणियों की ईर्ष्या करके उसने जो धन प्राप्त किया वह वह रास्ता है जिससे वह इस संसार को छोड़ता है।
"इस प्रकार, भगवान श्री हरि के प्रबंध से, परिजनों का भरण-पोषण करने वाले को उसकी पापपूर्ण गतिविधियों के लिए नारकीय स्थिति में डाल दिया जाता है, ठीक उसी तरह जैसे उस व्यक्ति को जिसने अपना धन खो दिया है।
"इसलिए एक व्यक्ति जो केवल काले तरीकों से अपने परिवार और परिजनों का भरण-पोषण करने के लिए बहुत उत्सुक है, वह निश्चित रूप से नरक के सबसे काले क्षेत्र में जाता है, जिसे अंध-तामिस्र के रूप में जाना जाता है।
"सभी दुखद, नारकीय परिस्थितियों से गुजरने और मानव जन्म से पहले जानवरों के सबसे निचले रूपों से नियमित क्रम में गुजरने के बाद, और इस प्रकार अपने पापों से शुद्ध होने के बाद, वह पुनः इस पृथ्वी पर एक इंसान के रूप में पुनः जन्म लेता है।
"भगवान श्री हरि ने कहा: भगवान के अधीन और उसके कार्य के परिणाम के अनुसार, जीव, आत्मा, को एक विशेष प्रकार का शरीर धारण करने के लिए पुरुष वीर्य के कण के माध्यम से एक महिला के गर्भ में प्रवेश करने के लिए बनाया जाता है।
"पहली रात में, शुक्राणु और डिंब मिलते हैं, और पाँचवीं रात को मिश्रण एक बुलबुले में किण्वित हो जाता है। दसवीं रात को यह बेर जैसी आकृति में विकसित हो जाता है, और उसके बाद, यह धीरे-धीरे मांस के एक टुकड़े या एक अंडे में बदल जाता है, जैसा भी मामला हो।
"एक महीने के दौरान, एक सिर बनता है, और दो महीने के अंत में हाथ, पैर और अन्य अंग आकार लेना शुरू करते हैं। तीन महीने के अंत तक, नाखून, उंगलियाँ, पैर की उंगलियाँ, शरीर के बाल, हड्डियाँ और त्वचा दिखाई देने लगती हैं, जैसे शरीर के उत्पादन अंग और शरीर के अन्य छिद्र, जैसे आँखें, नथुने, कान, मुँह और गुदा।
"गर्भाधान की तिथि से चार महीने के भीतर, शरीर के सात आवश्यक तत्व, जैसे कायल, रक्त, मांस, वसा, हड्डी, मज्जा और वीर्य, अस्तित्व में आते हैं। पाँच महीने के अंत में, भूख और प्यास महसूस होने लगती है, और छह महीने के अंत में, भ्रूण, जो एमनियन से घिरा होता है, पेट के दाईं ओर चलना शुरू कर देता है।
"माँ द्वारा लिए गए भोजन और पेय पदार्थों से अपने पोषण प्राप्त करते हुए, भ्रूण बढ़ता है और मल और मूत्र के उस घृणित निवास में रहता है, जो सभी प्रकार के कीड़ों का प्रजनन स्थल है।
"पेट में ही भूखे कीड़ों द्वारा पूरे शरीर में बार-बार काटे जाने से, बच्चे को अपनी कोमलता के कारण भयानक पीड़ा होती है। इस तरह वह भयानक स्थिति के कारण पल-पल बेहोश हो जाता है।
"माँ के कड़वे, तीखे खाद्य पदार्थ खाने या ऐसे भोजन के कारण जो बहुत नमकीन या बहुत खट्टा होता है, बच्चे के शरीर को लगातार ऐसी पीड़ाएँ सहनी पड़ती हैं जो लगभग असहनीय होती हैं।
"एमनियन के अंदर रखा गया और आंतों द्वारा बाहर से ढका हुआ, बच्चा पेट के एक तरफ लेटा रहता है, उसका सिर उसके पेट की ओर मुड़ा होता है और उसकी पीठ और गर्दन धनुष की तरह मुड़ी होती है।
"इस प्रकार बच्चा पिंजरे में बंद पक्षी की तरह ही रहता है, बिना चलने-फिरने की स्वतंत्रता के। उस समय, यदि बच्चा भाग्यशाली होता है, तो वह अपने पिछले सौ जन्मों के सभी कष्टों को याद कर सकता है, और वह दयनीय रूप से दुःखी होता है। उस स्थिति में मन की शांति की क्या संभावना है?
"इस प्रकार अपनी गर्भधारण के सातवें महीने से चेतना के विकास से संपन्न बच्चा, प्रसव से पहले हफ्तों के दौरान भ्रूण को दबाने वाली हवाओं द्वारा नीचे की ओर फेंका जाता है। उसी गंदे उदर गुहा में पैदा हुए कीड़ों की तरह, वह एक जगह नहीं रह सकता।
"जीवन की इस भयावह स्थिति में जीवित इकाई, भौतिक अवयवों की सात परतों से बंधी हुई, भगवान से हाथ जोड़कर प्रार्थना करती है, जिसने उसे उस स्थिति में डाल दिया है।
"मानव आत्मा कहती है: मैं भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के चरण कमलों की शरण लेती हूं, जो अपने विभिन्न शाश्वत रूपों में प्रकट होते हैं और दुनिया की सतह पर चलते हैं। मैं केवल उसी की शरण लेता हूं, क्योंकि वह मुझे सभी भय से मुक्ति दिला सकता है और उसी से मुझे यह जीवन स्थिति मिली है, जो मेरी अधर्मी गतिविधियों के लिए बिल्कुल उपयुक्त है।
"मैं, जो शुद्ध आत्मा हूं, अब मेरी गतिविधियों से बंधी हुई प्रकट हो रही हूं, माया की व्यवस्था से मेरी मां के गर्भ में पड़ी हूं। मैं उसे अपना सम्मानपूर्वक प्रणाम करता हूं जो मेरे साथ भी है लेकिन अप्रभावित और अपरिवर्तनीय है। वह असीमित है, लेकिन पश्चातापी हृदय में उसे महसूस किया जाता है। मैं उसे अपना सम्मानपूर्वक प्रणाम करता हूं।
"मैं पाँच तत्वों से बने इस भौतिक शरीर में होने के कारण सर्वोच्च भगवान से अलग हो गया हूं, और इसलिए मेरे गुण और इंद्रियाँ दुरुपयोग की जा रही हैं, हालांकि मैं अनिवार्य रूप से आध्यात्मिक हूं। क्योंकि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व भौतिक प्रकृति और जीवित संस्थाओं के लिए पारलौकिक है, क्योंकि वह ऐसे भौतिक शरीर से रहित है, और क्योंकि वह हमेशा अपने आध्यात्मिक गुणों में गौरवशाली है, मैं उसे प्रणाम करता हूं।
"मानव आत्मा आगे प्रार्थना करती है: जीवित इकाई को भौतिक प्रकृति के प्रभाव में डाल दिया जाता है और जन्म और मृत्यु के बार-बार आने वाले मार्ग पर अस्तित्व के लिए कठोर संघर्ष जारी रखता है। यह सशर्त जीवन भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के साथ उसके संबंध को भूलने के कारण है। इसलिए, भगवान की दया के बिना, वह कैसे फिर से भगवान की पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा में संलग्न हो सकता है?
**"सर्वव्यापी परमात्मा, भगवान का आंशिक प्रतिनिधि, परमेश्वर श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई नहीं है, जो सभी सजीव और निर्जीव वस्तुओं का संचालन कर रहा है। वे समय के तीनों चरणों - भूत, वर्तमान और भविष्य में विद्यमान हैं। इस प्रकार, वही सशर्त आत्मा को विभिन्न गतिविधियों में नियुक्त करते हैं। इस सशर्त जीवन के तीन गुना दुखों से मुक्त होने के लिए, हमें केवल उन्हीं के प्रति समर्पण करना होगा।**
**"मां के गर्भ के भीतर खून, मल और मूत्र से बने कुंड में गिरा, मां की पेट की आग से अपने शरीर में जलता हुआ, बाहर निकलने के लिए चिंतित, वह देहरूपी प्राणी अपने महीनों की गिनती करता है और प्रार्थना करता है: हे मेरे प्रभु, मैं, एक दुखी आत्मा, कब इस कारावास से मुक्त होऊंगा?**
**"हे मेरे प्रभु, आपकी अकारण दया से मैं चेतना जागृत हो गया हूं, यद्यपि मेरी आयु केवल दस महीने है। सर्वत्र पतित आत्माओं के मित्र, परमेश्वर श्रीकृष्ण की इस अकारण दया के लिए, जोड़कर हाथों से प्रार्थना के अतिरिक्त मेरे पास आभार व्यक्त करने का कोई उपाय नहीं है।**
**एक अन्य प्रकार के शरीर में जीवित प्राणी केवल प्रवृत्ति से देखता है। वह उस विशेष शरीर के केवल सहनीय और असहनीय संवेदी अनुभवों को ही जानता है। लेकिन मुझे एक ऐसा शरीर मिला है जिसमें मैं अपनी इंद्रियों को नियंत्रित कर सकता हूं और अपने लक्ष्य को समझ सकता हूं। इसलिए, परमेश्वर श्रीकृष्ण को अपना नमन प्रस्तुत करता हूं, जिनकी कृपा से मुझे यह शरीर मिला है और जिनकी कृपा से मैं उन्हें भीतर और बाहर देख सकता हूं।**
**"इसलिए, हे प्रभु, यद्यपि मैं एक भयानक स्थिति में रह रहा हूं, मैं अपनी मां के गर्भ से विदा नहीं होना चाहता जिससे मैं भौतिकवादी जीवन के अंधे कुएं में फिर से गिर जाऊं। आपकी बाहरी ऊर्जा, जिसे देव-माया कहा जाता है, नवजात शिशु को एक बार में पकड़ लेती है, और तुरंत झूठी पहचान, जो कि निरंतर जन्म और मृत्यु के चक्र की शुरुआत है, शुरू हो जाती है।**
**"इसलिए, अब और उत्तेजित हुए बिना, मैं अपने मित्र, स्पष्ट चेतना की सहायता से, अपने अज्ञान के अंधकार से अपने को मुक्त करूंगा। भगवान विष्णु के कमल चरणों को अपने दिमाग में बस रखकर, मैं बार-बार जन्म और मृत्यु के लिए कई माताओं के गर्भ में प्रवेश करने से बच जाऊंगा।**
**भगवान कपिल ने जारी रखा: दस महीने का जीवित प्राणी गर्भ में रहते हुए भी ये इच्छाएं करता है। लेकिन जब वह भगवान की इस प्रकार प्रशंसा करता है, तो बच्चे के जन्म में सहायत करने वाली हवा जोर से उसे धकेलती है और उसका चेहरा नीचे की ओर होने वाला बनता है ताकि वह पैदा हो सके।**
**अचानक हवा द्वारा नीचे धकेले जाने पर, बच्चा बड़ी मुश्किल से नीचे की ओर सिर करके बाहर आता है, सांस फूल रहा है और भयंकर पीड़ा के कारण उसकी स्मरणशक्ति चली जाती है।**
**इस प्रकार बच्चा मल और खून से सना हुआ जमीन पर गिर जाता है, और मल द्वारा उत्पन्न एक कीड़े की भांति वह खेलता रहता है। वह अपने श्रेष्ठ ज्ञान को खो देता है और माया के वशीभूत होकर रोता है।**
**गर्भ से बाहर आने के बाद, बच्चे को ऐसे लोगों की देखभाल के लिए दिया जाता है जो उसकी इच्छाओं को समझ नहीं पाते हैं, और इस प्रकार ऐसे लोगों द्वारा उसकी परवरिश की जाती है। अपनी इच्छानुसार जो कुछ भी उसे दिया जाता है उसे वह प्राप्त करने में असमर्थ होता है।**
**पसीने और कीटाणुओं से भरे हुए एक गंदे बिस्तर पर लेटा हुआ, बेचारा बच्चा अपने शरीर को खरोंच कर खुजली से राहत पाने में असमर्थ होता है, बैठने, खड़े होने या यहां तक कि हिलने-डुलने की तो बात ही छोड़ दें।**
**अपनी असहाय स्थिति में, मच्छर, मक्खियां, कीड़े और अन्य कीटाणु उस बच्चे को काटते हैं, जिसकी त्वचा कोमल होती है, जैसे छोटे कृमि बड़े कृमि को काटते हैं। अपनी बुद्धि से वंचित, बच्चा फूट-फूट कर रोता है।**
**इस प्रकार, विभिन्न प्रकार के कष्टों को झेलते हुए, बच्चा अपने बचपन से गुजरता है, और किशोरावस्था प्राप्त करता है। किशोरावस्था में भी वह उन चीजों को पाने की इच्छाओं पर कष्ट पाता है जो वह कभी हासिल नहीं कर सकता। और इस प्रकार, अज्ञानता के कारण, वह क्रोधित और दुखी हो जाता है।**
**शरीर की वृद्धि के साथ, जीव अपने आत्मा को जीतने के लिए, अपनी झूठी प्रतिष्ठा और क्रोध को बढ़ाता है और इस प्रकार समान रूप से कामुक लोगों के प्रति शत्रुता पैदा करता है।**
**ऐसे अज्ञान से जीव पांच तत्वों से बने भौतिक शरीर को ही अपने रूप में स्वीकार करता है। इस गलतफहमी के साथ, वह अप्रतिष्ठित चीजों को अपना मानकर अंधेरे क्षेत्र में अपनी अज्ञानता को बढ़ाता है।**
शरीर के लिए जो, उसे निरंतर कष्ट देता है और अज्ञान और काम्य क्रियाओं के बंधन के कारण उसके पीछे-पीछे फिरता है, वह कई कर्म करता है जिसके कारण उसे जन्म-मरण के चक्र में लगातार डाला जाता है "-- इस कृष्ण से विमुख होकर उन्हें भूलने वाले जीवों द्वारा अनुभव किए जाने वाले गर्भ की पीड़ा, दुख और समय के चक्र की यातनाओं के बारे में गंभीरता से चर्चा की जानी चाहिए। [इस बिंदु तक का तात्पर्य पद 204-236 पर लागू होता है।] समय के साथ जन्म, पालन-पोषण और मृत्यु की भौतिक दुनिया की प्रत्येक सांसारिक वस्तु का क्रमिक रूप से जन्म होता है, विकास होता है, कुछ समय तक रहती है, उप-उत्पादों का उत्पादन करती है और मर जाती है। अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हुए, आध्यात्मिक जीव कृष्ण से संबंधित नहीं होने वाली भौतिक वस्तुओं के लालच के कारण कृष्ण की पूजा छोड़ देता है। उस बिंदु पर उसकी प्राकृतिक विशेषताओं को स्थानांतरित कर दिया जाता है और भौतिक सुख की प्रवृत्ति उसे स्वादिष्ट लगती है। यही कारण है कि जीव अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करता है और भौतिक अस्तित्व के परिणामी दुखों को झेलता है। अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने के परिणामस्वरूप, जीव बार-बार स्थूल और सूक्ष्म शरीरों से आच्छादित होकर इस नाशवान दुनिया में डाल दिया जाता है। अपनी संवैधानिक स्थिति को भूलकर और कृष्ण की पूजा के प्रयास को छोड़कर, वह तब या तो अपने कर्म के फल का आनंद लेना चाहता है या ज्ञान के माध्यम से फलों का त्याग करना चाहता है। इसलिए, जब वह कृष्ण के चरणकमलों की सेवा को छोड़ देता है, तो वह अपनी संवैधानिक स्थिति से वंचित हो जाता है और गिर जाता है और बार-बार जन्म और मृत्यु का हार पहनता है। जब ऐसी दयनीय आत्मा की मृत्यु होती है, तो उसका स्थूल शरीर धीरे-धीरे पाँच स्थूल भौतिक तत्वों के साथ मिल जाता है और उसका सूक्ष्म शरीर, जो भौतिक सुख की इच्छाओं से भरा होता है, स्थूल शरीर को पीछे छोड़ देता है और बेसब्री से दूसरे स्थूल शरीर की प्रतीक्षा करता है। सर्वोच्च प्रभु के निर्देशन में, जो सभी को उनकी गतिविधियों का फल प्रदान करता है, वह सूक्ष्म शरीर फिर से अपने कर्म के फलों के अनुसार एक विशेष प्रकार के स्थूल शरीर में निवास करता है। इस प्रकार वह अपनी अतृप्त इच्छाओं को पूरा करने में सक्रिय रूप से संलग्न होता है। मृत्यु के बाद, जब वह अपनी माँ के गर्भ में एक नया स्थूल शरीर ग्रहण करता है, तो उसकी पहले से संचित पापी प्रतिक्रियाएँ उसके स्थूल शरीर में बीमारियों या विकृत अंगों के रूप में प्रकट होती हैं। इस नए स्थूल शरीर में अपनी पहले से प्राप्त पापी प्रतिक्रियाओं के बोझ को सहने के लिए, दयनीय आत्मा अपने पापों के परिणामस्वरूप विकृत अंगों और रोगग्रस्त शरीरों को प्राप्त करती है और फिर स्थूल इंद्रिय तृप्ति में लिप्त हो जाती है। इसके बाद, पिछले पापों के परिणामस्वरूप, दयनीय आत्मा या तो अपने द्वारा पैदा किए गए पुत्रों और पुत्रियों का पिता या माँ बन जाती है। जब तक उसका आध्यात्मिक ज्ञान आध्यात्मिक गुरु और कृष्ण की निःस्वार्थ दया से जागृत नहीं होता, तब तक उसकी फलती और अफलती पापी प्रतिक्रियाएँ पूरी तरह से समाप्त नहीं होती हैं। जब कृष्ण से विमुखता की विशेषता दयनीय आत्माओं में शरीर को स्वयं के रूप में स्वीकार करने की मानसिकता उत्पन्न करती है, तो कभी-कभी अकारण दयालु कृष्णचंद्र व्यक्तिगत रूप से आते हैं और कभी-कभी कृष्णचंद्र अपने प्रिय सहयोगी को एक शिक्षक, प्रचारक या आध्यात्मिक दुनिया की पारलौकिक ध्वनियों के उद्धारक के रूप में भेजते हैं, जो भूल चुकी दुर्भाग्यपूर्ण आत्माओं की संवैधानिक स्थिति को पुनर्जीवित करने के लिए कृष्ण को पुनर्जीवित करते हैं। अपनी माँ के गर्भ में रहते हुए, दयनीय आत्मा अपनी पिछली पापपूर्ण गतिविधियों की सजा के रूप में बीमारी के रूप में कई तरह के दुख या संकट झेलती है, इस प्रकार उन पिछले पापों का हिसाब करती है।
