श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 203
 
 
श्लोक  2.1.203 
চিত্ত দিযাশুন, মাতা! জীবের যে গতি
কৃষ্ণ না ভজিলে পায যতেক দুর্গতি
चित्त दियाशुन, माता! जीवेर ये गति
कृष्ण ना भजिले पाय यतेक दुर्गति
 
 
अनुवाद
“प्रिय माँ, कृपया ध्यानपूर्वक जीवात्मा के गंतव्य के बारे में तथा कृष्ण की पूजा न करने से उसे होने वाले कष्ट के बारे में सुनें।
 
“Dear Mother, please listen carefully about the destination of the soul and the suffering it will suffer if it does not worship Krishna.
तात्पर्य
जीवों की दयनीय स्थिति, जो भगवान कृष्ण की सेवा से वंचित हैं, का वर्णन चैतन्य-चरितामृत (मध्य 20.117-118) में इस प्रकार किया गया है:

कृष्ण भुली' सेई जीव अनादि-बहिर्मुखा

अतएव माया तारे देया संसार-दुःखा

कभु स्वर्ग उठाया, कभु नरके डुबाया

दंड्य-जने राजा येन नदीते चुबाया

"कृष्ण को भूलकर, जीव अनादि काल से बाह्य रूप से आकर्षित हुआ है। इसलिए माया उसे उसके भौतिक अस्तित्व में सभी प्रकार का दुख देती है। भौतिक स्थिति में, जीव को कभी उच्च ग्रह प्रणालियों और भौतिक समृद्धि के लिए उठाया जाता है और कभी नारकीय स्थिति में डूब जाता है। उसकी स्थिति बिल्कुल एक अपराधी की तरह होती है जिसे राजा पानी में डुबोकर दंडित करता है और फिर उसे फिर से पानी से बाहर निकालता है।"

विशेष रूप से भगवान कपिलदेव के अपनी माता देवहूति के प्रति कथनों पर चर्चा करनी चाहिए, जो श्रीमद भागवतम, तृतीय खंड, अध्याय तीस और अध्याय इकतीस, श्लोक 1-31 में पाए जाते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)