श्रीमद् भागवत (3.25.43) में भगवान कपिल देव अपनी माँ देवहूति से कहते हैं कि :
ज्ञाना-वैराग्य-युक्तेना
भक्ति-योगेना योगिन:
क्षेमाया पाद-मूलं मे
प्रविशंति अकुतो-भयम
"जो लोग ज्ञान और विरक्ति से युक्त होकर भक्ति-योग करते हैं वे मेरे चरणों की शरण ग्रहण करते हैं और चूँकि मैं भगवान हूँ, इसलिए वे बिना किसी भय के स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के पात्र बन जाते हैं।"
जन्म और मृत्यु के फंदे में पड़े व्यक्ति कृष्ण से विमुख और भूले रहते हैं और अपनी माताओं के गर्भ में अनेक कष्टों को झेलते हैं। दूसरी ओर, भगवान के भक्त अपनी माताओं के गर्भ में रहते हुए किसी भी तरह की असुविधा या घृणा का अनुभव नहीं करते; बल्कि भगवान की इच्छा से वे गर्भ में रहने के दुखों के प्रति उदासीन रहते हैं और उस अवस्था में भी भगवान की सेवा में लगे रहते हैं। वास्तव में, भगवान के भक्त अपने जीवन के किसी भी पड़ाव पर किसी भी प्रकार का कष्ट महसूस नहीं करते, वर्तमान या भविष्य के जीवन में; वे निरंतर कृष्ण की सेवा के आनंद में लीन रहते हैं। इस तथ्य का सर्वोत्तम उदाहरण है महा-भागवत श्री प्रह्लाद द्वारा अपनी माँ कयाधु के गर्भ में रहते हुए कृष्ण का निरंतर स्मरण।
