श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 199-201
 
 
श्लोक  2.1.199-201 
“শুন শুন, মাতা! কৃষ্ণ-ভক্তির প্রভাব
সর্ব-ভাবে কর মাতা! কৃষ্ণে অনুরাগ
কৃষ্ণ-সেবকের মাতা! কভু নাহি নাশ
কাল-চক্র ডরায দেখিযা কৃষ্ণ-দাস
গর্ভ-বাসে যত দুঃখ জন্মে বা মরণে
কৃষ্ণের সেবক, মাতা, কিছুই না জানে
“शुन शुन, माता! कृष्ण-भक्तिर प्रभाव
सर्व-भावे कर माता! कृष्णे अनुराग
कृष्ण-सेवकेर माता! कभु नाहि नाश
काल-चक्र डराय देखिया कृष्ण-दास
गर्भ-वासे यत दुःख जन्मे वा मरणे
कृष्णेर सेवक, माता, किछुइ ना जाने
 
 
अनुवाद
"हे माँ, कृष्ण की भक्ति की महिमा सुनो। सभी प्रकार से कृष्ण के प्रति आसक्त रहो! हे माँ, कृष्ण के सेवक कभी नष्ट नहीं होते। कृष्ण के भक्तों को देखकर कालचक्र भी भयभीत हो जाता है। हे माँ, कृष्ण के सेवक गर्भ में रहने, जन्म लेने या मरने के कष्टों से नहीं गुजरते। हे माँ, कृष्ण के सेवकों को गर्भ में रहने, जन्म लेने या मरने के कष्ट नहीं होते। हे माँ, कृष्ण के सेवकों को गर्भ में रहने, जन्म लेने या मरने के कष्ट नहीं होते। हे माँ, कृष्ण के सेवकों को गर्भ में रहने, जन्म लेने या मरने के कष्ट नहीं होते। हे माँ, कृष्ण के सेवकों को गर्भ में रहने, जन्म लेने या मरने के कष्ट नहीं होते। हे माँ, कृष्ण के सेवकों को गर्भ में रहने, जन्म लेने या मरने के कष्ट नहीं होते।"
 
"O Mother, listen to the glories of Krishna's devotion. Be attached to Krishna in all respects! O Mother, Krishna's servants never perish. Even the wheel of time becomes frightened on seeing Krishna's devotees. O Mother, Krishna's servants do not suffer the pains of being in the womb, being born, or dying ...."
तात्पर्य
कृष्ण की भक्ति और उनके भक्तों की महिमा का गुणगान करने के लिए श्रीमद् भागवत (3.25.32 -44) में माँ देवहूति से भगवान् कपिलदेव के संवाद का अवलोकन करना चाहिए। कृष्ण का भक्त भौतिक काल के कारणों से होने वाले जन्म, भरण-पोषण और मरण के चक्र से नहीं गुजरता जैसा कि बद्ध आत्माएँ करती हैं। वास्तव में भगवान के भक्त समय के प्रभाव में नहीं आते; वे भक्तिमय जीवन जीते हैं और अनंत काल तक श्री हरि की सेवा करते हैं। समय का भयानक चक्र जो जीवों में जन्म, भरण-पोषण और मरण का कारण बनता है वो भी भक्तों की सेवा के प्रभाव को देखकर भयभीत हो जाता है। समय का भयानक चक्र बद्ध आत्माओं या कृष्ण से विमुख लोगों को विभिन्न जीव-जातियों में भटकने के लिए विवश करता है; दूसरे शब्दों में ये उन्हें जन्म लेने पर विवश करता है और अंत में उनकी हत्या कर देता है। लेकिन चूँकि भगवान के भक्त शाश्वत, आध्यात्मिक और आत्म-साक्षात्कारी होते हैं, इसलिए समय का भयानक चक्र उन्हें छू नहीं सकता; बल्कि एक आज्ञाकारी सेवक की तरह वह उनका अनुसरण करता है।

श्रीमद् भागवत (3.25.43) में भगवान कपिल देव अपनी माँ देवहूति से कहते हैं कि :

ज्ञाना-वैराग्य-युक्तेना

भक्ति-योगेना योगिन:

क्षेमाया पाद-मूलं मे

प्रविशंति अकुतो-भयम

"जो लोग ज्ञान और विरक्ति से युक्त होकर भक्ति-योग करते हैं वे मेरे चरणों की शरण ग्रहण करते हैं और चूँकि मैं भगवान हूँ, इसलिए वे बिना किसी भय के स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के पात्र बन जाते हैं।"

जन्म और मृत्यु के फंदे में पड़े व्यक्ति कृष्ण से विमुख और भूले रहते हैं और अपनी माताओं के गर्भ में अनेक कष्टों को झेलते हैं। दूसरी ओर, भगवान के भक्त अपनी माताओं के गर्भ में रहते हुए किसी भी तरह की असुविधा या घृणा का अनुभव नहीं करते; बल्कि भगवान की इच्छा से वे गर्भ में रहने के दुखों के प्रति उदासीन रहते हैं और उस अवस्था में भी भगवान की सेवा में लगे रहते हैं। वास्तव में, भगवान के भक्त अपने जीवन के किसी भी पड़ाव पर किसी भी प्रकार का कष्ट महसूस नहीं करते, वर्तमान या भविष्य के जीवन में; वे निरंतर कृष्ण की सेवा के आनंद में लीन रहते हैं। इस तथ्य का सर्वोत्तम उदाहरण है महा-भागवत श्री प्रह्लाद द्वारा अपनी माँ कयाधु के गर्भ में रहते हुए कृष्ण का निरंतर स्मरण।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)