श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 197
 
 
श्लोक  2.1.197 
“চণ্ডাল ’চণ্ডাল’ নহে—যদি ’কৃষ্ণ’ বলে
বিপ্র ’বিপ্র’ নহে,—যদি অসত্পথে চলে”
“चण्डाल ’चण्डाल’ नहे—यदि ’कृष्ण’ बले
विप्र ’विप्र’ नहे,—यदि असत्पथे चले”
 
 
अनुवाद
“यदि कोई चाण्डाल कृष्ण का नाम जपता है तो वह चाण्डाल नहीं है, और यदि कोई ब्राह्मण पाप कर्मों में लिप्त रहता है तो वह ब्राह्मण नहीं है।”
 
“If a Chandala chants the name of Krishna, he is not a Chandala, and if a Brahmin indulges in sinful activities, he is not a Brahmin.”
तात्पर्य
यदि कृष्ण के भक्त कुत्ते खाने वालों के परिवार में भी जन्म लेते हैं, तो वे वास्तव में श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं; और शास्त्रों के अनुसार, एक नास्तिक जो पापी है और कृष्ण की भक्ति से रहित है, भले ही वह ब्राह्मण परिवार में जन्म लेता हो, निश्चित रूप से कुत्ता खाने वाला होता है। इनमें से किसी को भी साधारण जाति के विचार से देखना वर्जित है। उनके वर्ण का पता उनके स्वाद, व्यवसाय और स्वभाव या लक्षणों से लगाया जाना चाहिए। श्रुतियों, स्मृतियों, पुराणों, इतिहासों और पंचरात्रों से शुरू होने वाले सभी शास्त्रों का यही उद्देश्य और निष्कर्ष है। छान्दोग्य उपनिषद पर अपनी टीका में, श्री माधवाचार्य साम-संहिता से इस प्रकार उद्धृत करते हैं:

आरजवं ब्राह्मणे साक्षात्

शूद्रो 'नार्जव-लक्षणःगौतमः

त्विति विज्ञाय सत्यकाम उपानयत्

"एक ब्राह्मण में सरलता का गुण होता है, और एक शूद्र में कुटिलता का गुण होता है। इस तथ्य को जानकर, गौतम ने सत्यकाम को पवित्र धागा दीक्षा प्रदान की और उसे प्रथम श्रेणी का ब्राह्मण बनाया।"

ब्रह्म-सूत्र (1.3.34) में कहा गया है: शुगस्य तदनदर-श्रवणात् तदाद्रवणात् सूच्यते हि-"पौत्रायण को शूद्र कहकर संबोधित किया गया था क्योंकि उसने अपने बारे में कही गई अपमानजनक बातों को सुनकर दुखी होकर रैक्‍व के पास जाने का प्रयास किया था।" श्री पूर्णप्रज्ञ माधवाचार्य ने इस सूत्र पर अपनी टीका में कहा है: नासौ पौत्रायणःशूद्रःशुचद्-द्रवणमेव हि शुदत्वम्-"राजा पौत्रायण जन्म से शूद्र नहीं थे, लेकिन चूंकि वे विलाप कर रहे थे इसलिए उन्हें शूद्र माना जाता था।" दूसरे शब्दों में, "जो विलाप से प्रभावित होता है उसे शूद्र कहा जाता है।" पद्म पुराण में कहा गया है:

राजा पौत्रायणःशोकात्

छूद्रेति मुनिनोदितःप्राण-विद्यामवाप्यास्मात् परं धर्ममवापवान

"राजा पौत्रायण क्षत्रिय थे, फिर भी अपने विलाप के कारण, रैक्‍व मुनि ने उन्हें शूद्र कहा था। बाद में राजा ने रैक्‍व से प्राण पर गोपनीय ध्यान सीखने के बाद जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया।"

महाभारत (वन-पर्व 180.26) में कहा गया है:

यत्रैतलक्षणं सर्प

वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतःयत्रैतन

न भवेत् सर्प

तंशूद्रमिति निर्दिशेत्

"हे नाग, केवल ब्राह्मण के गुणों से युक्त व्यक्ति को ही ब्राह्मण कहा जा सकता है, अन्यथा वह शूद्र है।"

महाभारत (वन-पर्व 180.23-26) पर अपनी टीका में श्री नीलकंठ ने लिखा है: "इसी तरह, यदि शूद्र में सत्य जैसी गुणवत्ता है, तो वह ब्राह्मण है। एक शूद्र के लक्षण, जैसे वासना, ब्राह्मण में मौजूद नहीं होते हैं, और ब्राह्मण के लक्षण, जैसे शांति, एक शूद्र में मौजूद नहीं होते हैं। यदि शूद्र के रूप में जन्म लेने वाले में शांति जैसे गुण हैं, तो वह ब्राह्मण है। और यदि ब्राह्मण के रूप में जन्म लेने वाले में वासना जैसे गुण हैं, तो वह शूद्र है। इसमें कोई संदेह नहीं है।"

महाभारत (शांति-पर्व 189.8) में कहा गया है:

शूद्रे चैतद भवेत् लक्ष्यं द्विजे तच्च न विद्यते

न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो ब्राह्मणो न च

"यदि ब्राह्मण के लक्षण शूद्र में पाए जाते हैं और यदि शूद्र के लक्षण ब्राह्मण में पाए जाते हैं, तो शूद्र को शूद्र नहीं कहा जाना चाहिए और ब्राह्मण को ब्राह्मण नहीं कहा जाना चाहिए।"

महाभारत (वन-पर्व 215.13-15) में कहा गया है:

ब्राह्मणः पतनीयेषु वर्तमानो विकर्मसु

दांभिको दुष्कृतः प्राज्ञः शूद्रेण सदृशो भवेत्

यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततौत्थितः

तं ब्राह्मणमहममन्ये वृत्तेन हि भवेद् द्विजः

"आखिरकार, एक ब्राह्मण जो गर्वित है और विभिन्न पापपूर्ण गतिविधियों में लिप्त है जिसके परिणामस्वरूप वह अशुद्ध कर्म से दूषित होने के पतन में गिर जाता है, वह एक शूद्र के बराबर है। और मैं उस शूद्र को ब्राह्मण मानता हूं जो आत्म-संयमी, सत्यवादी है, और हमेशा अपने धार्मिक कर्तव्यों को निभाने के लिए उत्सुक रहता है। वास्तव में, ब्राह्मण होने का एकमात्र मानदंड हरि की पूजा के रूप में शुद्ध व्यवहार करना है।"

महाभारत (शांति-पर्व 188.13 और 189.7) में कहा गया है:

हिंसा अनृत-प्रिया लुब्धाः

सर्व-कर्मोपजीविनःकृष्णःशौच-परिभ्रष्टास्ते द्विजाःशूद्रतां गताः

सर्व-भक्ष-रतिर्नित्यं

सर्व-कर्म-करो

'शुचित्यक्त-वेदस्त्वनाचारः

स वै शूद्र इति स्मृतः

“जब ब्राह्मण हिंसा करते हैं, झूठ बोलते हैं, लोभी बन जाते हैं, सब तरह से अपना जीविकोपार्जन करते हैं, और पापमय गतिविधियों में संलग्न होकर अपनी पवित्रता खो देते हैं, तब वे शूद्र बन जाते हैं। जो सभी प्रकार के भोजन करने और सभी प्रकार की गतिविधियों को करने से जुड़ा हुआ है, जो अशुद्ध, वैदिक संस्कृति के सिद्धांतों से भटक गया है, और बुरी तरह से व्यवहार करता है, उसे शूद्र के रूप में जाना जाता है।"

महाभारत में (अनुंशासन-पर्व 143.50-51) यह कहा गया है:

ना योनिर् नापि संष्कारो न श्रुतं न च स

अंतितिःकारणानि द्विजत्वस्य वृत्तम् एव तु कारणम्

सर्वोऽयं ब्राह्मणो लोके वृत्तेन तु विधीयते

वृत्ते स्थितस्तु शूद्रोऽपि ब्राह्मणत्वं नियच्छति

"जन्म, संस्कार, वेदों का अध्ययन और अच्छा जन्म ब्राह्मण होने का मापदंड नहीं है। एकमात्र मापदंड उसका व्यवसाय है। एक व्यक्ति इस दुनिया में केवल अपने स्वभाव के परिणामस्वरूप ब्राह्मण के रूप में पैदा होता है। ब्राह्मण के व्यवसाय में स्थित शूद्र भी ब्राह्मण बन जाता है।"

हरि-भक्ति-विलास (दसवां विलास) पद्म पुराण से इस प्रकार उद्धृत करता है:

न शूद्रा भगवद्भक्तास्ते तु भागवता मताः

सर्व-वर्णेषु ते शूद्रा ये ना भक्ता जनार्दने

"भगवान के भक्त कभी भी शूद्र नहीं होते, बल्कि वे सभी प्रथम श्रेणी के भागवत होते हैं। लेकिन अगर कोई भगवान कृष्ण का भक्त नहीं है, तो उसे शूद्र माना जाना चाहिए, भले ही वह ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य परिवार में पैदा हुआ हो।"

अत्रि-संहिता (372) में कहा गया है:

ब्रह्म-तत्वं न जानाति ब्रह्म-सूत्रेण गर्वातिः

तेनैव स च पापेन विप्रः पशु उदाहृतः

"एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति जो गर्व से खुद को पवित्र ब्राह्मण के रूप में प्रचारित करता है, लेकिन परम सत्य से अनजान है, इसी पाप के कारण जानवर कहलाता है।"

बृहद-आरण्यक उपनिषद (3.9.10) में कहा गया है:

एतदक्षरं गार्गी विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः

"हे गार्गी, जो उस अचूक सत्य से परिचित है जिसके द्वारा मृत्यु को पार किया जाता है, वह ब्राह्मण है।"

बृहद-आरण्यक उपनिषद (4.4.21) में कहा गया है:

तम एव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः

"एक बुद्धिमान व्यक्ति जो भक्ति की प्रक्रिया के माध्यम से सर्वोच्च भगवान, परब्रह्म को जानता है, ब्राह्मण है।"

पद्म पुराण (उत्तर-खंड, अध्याय 39) में कहा गया है:

विष्णोरयं यतो ह्यासीत्तस्माद्वैष्णव उच्यते

सर्वेशाँ चैव वर्णानां वैष्णव श्रेष्ठ उच्यते

"जो भक्ति के माध्यम से विष्णु से संबंधित है, उसे वैष्णव कहा जाता है। एक सच्चा वैष्णव सभी वर्णों से श्रेष्ठ है और सर्वश्रेष्ठ है।"

पद्म पुराण (स्वर्ग-खंड, आदि 24) में कहा गया है:

सकृत्प्रणामी कृष्णस्य मातुः स्तन्यं पिबेन न हि

हरि-पादे मनो येषां तेभ्यो नित्यं नमो नमः

पुक्कसःश्वपचो वापि ये चान्ये म्लेच्छ-जातियाः

तेऽपि वंद्या महाभागा हरि-पादैक-सेवकाः

"जो एक बार भी अपना झूठा अहंकार पूरी तरह से त्याग देता है और कृष्ण के चरण कमलों पर प्रणाम करता है, वह फिर कभी माँ का स्तन दूध नहीं पिएगा। जो अपने मन में हरि के पवित्र चरणों को रखता है, वह हमेशा पूजा के योग्य होता है। चाहे वह कुत्ता खाने वाला हो या म्लेच्छ हो, यदि वह शुद्ध भक्ति से श्री हरि के चरण कमलों की शरण लेता है और लगाव के साथ उनकी सेवा करता है, तो उसे सबसे भाग्यशाली और अत्यधिक पूजनीय माना जाना चाहिए।"

स्कंद पुराण में कहा गया है:

न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद-भक्तःश्वपचः प्रियः

तस्मै देयंततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा हि अहम्

"भले ही कोई व्यक्ति संस्कृत वैदिक साहित्य का बहुत विद्वान हो, उसे मेरा भक्त तब तक स्वीकार नहीं किया जाता जब तक कि वह भक्ति सेवा में शुद्ध न हो। भले ही कोई कुत्ता खाने वालों के परिवार में पैदा हुआ हो, वह मुझे बहुत प्रिय है अगर वह एक शुद्ध भक्त है जिसका फलदायी गतिविधियों या मानसिक अटकलों का आनंद लेने का कोई उद्देश्य नहीं है। वास्तव में, उसे सभी प्रकार का सम्मान दिया जाना चाहिए, और जो कुछ भी वह प्रदान करता है उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। ऐसे भक्त मेरी तरह ही पूजनीय हैं।"

श्रीमद् भागवतम (3.33.7) में कहा गया है:

अहो बत श्व-पचोऽतो ग व्रीयान्

यज् जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्

तपस ते जुहुवुः सस्नुराया

ब्रह्मानूचुर्न नाम गृणन्ति ये ते

"ओह, वे कितने गौरवशाली हैं जिनकी जीभें तुम्हारा पवित्र नाम जपती हैं! डॉग-खाने वालों के परिवारों में जन्म लेने पर भी ऐसे व्यक्ति पूजनीय हैं। जो लोग तुम्हारे नाम का पवित्र नाम जपते हैं उन्हें सभी प्रकार की तपस्याएं करनी चाहिए और हवन करना चाहिए और आर्यों के सभी अच्छे शिष्टाचार प्राप्त करने चाहिए। तुम्हारे प्रभु के पवित्र नाम का जप करने के लिए उन्हें तीर्थ स्थानों में स्नान करना चाहिए, वेदों का अध्ययन करना चाहिए और आवश्यक सभी चीजों को पूरा करना चाहिए।"

भक्ति-संधर्भ (117) गरुड़ पुराण के निम्नलिखित छंदों को उद्धृत करता है:

ब्राह्मणानं सहस्रेभ्यः सत्र-याजी विशिष्यते

सत्र-याजी-सहस्रेभ्यः सर्व-वेदान्त-पारगः

सर्व-वेदान्त-विट-कोट्या विष्णु-भक्तो विशिष्यते

वैष्णवानं सहस्रेभ्यो एकांत्य एको विशिष्यते

"ऐसा कहा जाता है कि हजारों ब्राह्मणों में से एक बलिदान करने के लिए योग्य है, और ऐसे योग्य ब्राह्मणों के हजारों में से एक बलि प्रसाद में विशेषज्ञ ब्राह्मण सभी वैदिक ज्ञान से परे हो सकता है। उसे इन सभी ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। और फिर भी, ऐसे हजारों ब्राह्मणों में से जिन्होंने वैदिक ज्ञान को पार कर लिया है, एक व्यक्ति विष्णु-भक्त हो सकता है, और वह सबसे प्रसिद्ध है। हजारों ऐसे वैष्णवों में से एक जो भगवान कृष्ण की सेवा में पूरी तरह से स्थिर है, सबसे प्रसिद्ध है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)