श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 195
 
 
श्लोक  2.1.195 
সে-ই শাস্ত্র সত্য—কৃষ্ণ-ভক্তি কহে যায
অন্যথা হৈলে শাস্ত্র পাষণ্ডত্ব পায
से-इ शास्त्र सत्य—कृष्ण-भक्ति कहे याय
अन्यथा हैले शास्त्र पाषण्डत्व पाय
 
 
अनुवाद
“जो साहित्य कृष्ण भक्ति की महिमा का बखान करते हैं वे सच्चे शास्त्र हैं, अन्य केवल नास्तिक हैं।
 
“The literatures which glorify Krishna devotion are true scriptures, others are merely atheistic.
तात्पर्य
वे ही आध्यात्मिक ग्रन्थ सत्य होते हैं और परम धर्मसिद्धान्त स्थापित करते हैं, जो अज्ञानता के अंधकार का नाश करने वाले और कृष्ण की भक्ति की महिमा करने वाले होते हैं। यदि कोई भी साहित्य कृष्ण के नामों, रूपों, गुणों, उनके साथियों और लीलाओं से संबंधित विषयों की महिमा नहीं करता; कृष्ण के भक्तों की सर्वोच्च महिमा और शाश्वत स्थिति का वर्णन नहीं करता; और कृष्ण की भक्ति को जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने की सर्वोच्च प्रक्रिया के रूप में वर्णन नहीं करता है; तो उसे शास्त्र कहने के बजाय उसे नास्तिकों के बेकार बकवास के रूप में जाना जाना चाहिए। ऐसे शास्त्रों का कभी भी अध्ययन नहीं करना चाहिए, उन्हें बुरी संगति समझकर।

आपनी टीका में, श्री माधवाचार्य ने स्कंद पुराण से निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किए हैं:

ऋग-यजुः-साम-अथर्वाश्च भारतं पंचरात्रकम्।

मूल-रामायणं चैव शास्त्र इत्यभिधीयते।।

यच्चानुकूलमेतस्य तच्च शास्त्रं प्रकीर्तितम्।

अतोऽन्य ग्रन्थविस्तारो नैव शास्त्रं कुवात्म तत्।।

ऋग, यजु, साम और अथर्व वेद, साथ ही महाभारत, नारद-पंचरात्र और रामायण को निश्चित रूप से शास्त्र के रूप में जाना जाता है। वे पुस्तकें जो अनुकूल रूप से इन अधिकृत शास्त्रों के पदचिन्हों का अनुसरण करती हैं, उन्हें भी शास्त्रों में गिना जाता है। अन्य सभी साहित्य केवल गलत रास्ते पर ले जाते हैं और उन्हें कभी भी शास्त्र नहीं कहा जा सकता।

मत्स्य पुराण के निम्नलिखित श्लोक तत्व-संदर्भ में उद्धृत किए गए हैं:

सात्त्विकेषु च कल्पेषु माहात्म्यं अधिकं हरिः।

राजसेषु च माहात्म्यं अधिकं ब्रह्मणो विदुः।।

तद्वदग्नेश्च माहात्म्यं तामसेष्वूशिवस्य च।।

संकीर्णेषु सरस्वत्याः पितृणांश्च निगद्यते।।

सद्गुण के मोड में पुराण भगवान श्री कृष्ण की महिमा करते हैं; जुनून के मोड में ब्रह्मांड के निर्माता भगवान ब्रह्मा की महिमा का प्रचार करते हैं; और अज्ञानता के मोड में अग्नि, शिव और दुर्गा की महानता का जश्न मनाते हैं। इसके अतिरिक्त अच्छाई, जुनून और अज्ञानता के विभिन्न मिश्रणों से युक्त कई अन्य ग्रन्थ पूर्वजों, देवताओं और सरस्वती जैसी देवी-देवताओं की महिमा करते हैं।

कई अज्ञानी गधे जैसे लोग जो न तो अपने और न ही दूसरों के कल्याण की कामना करते हैं, ऐसा सोचते हैं कि चूंकि कृष्ण, कृष्ण के भक्तों और कृष्ण की भक्ति की महिमा करने वाला साहित्य भौतिक रूप से प्रेरित व्यक्तियों की आलोचना करता है जो संतुष्टि से जुड़े हैं, जैसे साहित्य इसलिए उनके अपने साहित्य की तरह हमेशा परस्पर विरोधी और सांप्रदायिक हैं। लेकिन कृष्ण की महिमा, कृष्ण के भक्तों और कृष्ण की अपनी माँ, श्री गौरसुंदर की भक्ति की महिमा का वर्णन करने के बहाने, मूर्ख, कामुक-ज्ञान-निर्भर व्यक्तियों को उनकी दोषपूर्ण कल्पनाओं से मुक्त करने के लिए सर्वोच्च सत्य समझाया। अज्ञानता के अंधकार को दूर करने वाले आध्यात्मिक साहित्य द्वारा कृष्ण की महिमा, कृष्ण के भक्तों और कृष्ण की भक्ति के कथन सांप्रदायिक नहीं हैं, हमेशा परस्पर विरोधी व्याख्याएँ हैं; बल्कि, वे उन सभी जीवित संस्थाओं के लिए एकमात्र सर्वोच्च शुभ निष्कर्ष हैं जो सर्वोच्च सौभाग्य की कामना करते हैं। वे नारकीय संकीर्ण विचार वाले लोग जो भौतिक अवधारणाओं से जुड़े हुए हैं, वे सोचते हैं कि भगवान विष्णु के स्रोत और भगवानों के भगवान कृष्ण भी देवताओं या कट्टर संप्रदाय के पूजनीय भगवान के बराबर प्रतिद्वंद्वी हैं। लेकिन अगर कोई ज्ञान-शास्त्रों का अध्ययन करने की बुरी संगति को छोड़ देता है, जो अवैयक्तिक विचारों पर आधारित हैं, और कर्म-शास्त्र, जो व्याख्याओं, फूलों की भाषा और कई देवताओं की पूजा के लिए निषेधाज्ञा से भरे हुए हैं, और इसके बजाय एकायन-शास्त्रों के अध्ययन में संलग्न हैं, जो प्रत्यक्ष करते हैं कृष्ण की भक्ति सेवा के लिए, तब उसे निश्चित रूप से जीवन की अंतिम पूर्णता प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)