श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 193-194
 
 
श्लोक  2.1.193-194 
প্রভু বলে,—“আজি পডিলাঙ কৃষ্ণ-নাম
সত্য কৃষ্ণ-চরণ-কমল গুণ-ধাম
সত্য কৃষ্ণ-নাম-গুণ-শ্রবণ-কীর্তন
সত্য কৃষ্ণচন্দ্রের সেবক যে-যে-জন
प्रभु बले,—“आजि पडिलाङ कृष्ण-नाम
सत्य कृष्ण-चरण-कमल गुण-धाम
सत्य कृष्ण-नाम-गुण-श्रवण-कीर्तन
सत्य कृष्णचन्द्रेर सेवक ये-ये-जन
 
 
अनुवाद
भगवान ने उत्तर दिया, "आज मैंने कृष्ण के नामों के बारे में पढ़ा। कृष्ण के चरणकमल वास्तव में दिव्य गुणों के भंडार हैं। कृष्ण के गुणों और नामों का श्रवण और कीर्तन ही सत्य है, और कृष्णचन्द्र के सेवक भी सत्य हैं।"
 
The Lord replied, "Today I read about Krishna's names. Krishna's lotus feet are truly a storehouse of transcendental qualities. Hearing and chanting Krishna's qualities and names is the truth, and the servants of Krishnachandra are also the truth."
तात्पर्य
शचीदेवी के पूछने पर प्रभु ने कहा, "केवल कृष्ण के चरण-कमल ही सभी दिव्य गुणों का मूल आश्रय या स्रोत हैं। वे सनातन, पवित्र, आदिम वस्तुएं हैं। सभी संयमित जीवों का सनातन कर्तव्य प्रभु के दिव्य नामों, रूपों, गुणों, सहयोगियों और लीलाओं को सुनना और उनका जप करना है, जो उन नामों द्वारा इंगित व्यक्ति से पूरी तरह से भिन्न नहीं हैं, उन रूपों को धारण करना, उन गुणों का प्रदर्शन करना, उन सहयोगियों के साथ रहना, और वे लीलाएँ करना। वे भक्त जो कृष्ण के नामों, रूपों, गुणों, सहयोगियों और लीलाओं को सुनते और जपते हैं, वे शाश्वत सत्य हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)