श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 171
 
 
श्लोक  2.1.171 
সহজেই শব্দ-মাত্রে ’কৃষ্ণ সত্য’ কহে
ঈশ্বর যে বাখানিবে,—কিছু চিত্র নহে
सहजेइ शब्द-मात्रे ’कृष्ण सत्य’ कहे
ईश्वर ये वाखानिबे,—किछु चित्र नहे
 
 
अनुवाद
प्रत्येक शब्द स्वाभाविक रूप से कृष्ण को परम सत्य के रूप में स्थापित करता है, अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भगवान् इस प्रकार व्याख्या करें।
 
Each word naturally establishes Krishna as the Absolute Truth, so it is no wonder that the Lord should explain it this way.
तात्पर्य
शुद्ध आध्यात्मिक आकाश से अभिव्यक्त कोई भी शब्द और प्रेम-मरहम से सुशोभित शाश्वत शुद्ध श्रवण-इंद्रियों से ग्रहण किया गया, निश्चित रूप से शाश्वत आदिम परम सत्य, कृष्ण से भिन्न नहीं है। इसलिए यह बहुत आश्चर्यजनक या विस्मयकारी नहीं है कि सर्वोच्च भगवान श्री विस्वंभर, जो जीवों में पाए जाने वाले गलतियों, भ्रम, धोखे और अपूर्णता के चार दोषों से रहित हैं, वे विद्वद्-रुढ़ि के माध्यम से हर शब्द के अर्थ की व्याख्या करेंगे जो शाश्वत, शुद्ध, पूर्ण, शाश्वत रूप से मुक्त, आध्यात्मिक और सबसे महत्वपूर्ण है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)