श्रीमद्भागवत (1.8.26) में कुंती ने कृष्ण से की प्रार्थना में इस श्लोक की दूसरी पंक्ति की पुष्टि की है:
जन्मैश्वर्य-श्रुत-श्रीभिः
एधमाना-मदः पुमान्
नैवारहत्यभिधातुं वै
त्वामकिंचन-गोचरम्
"हे भगवान, आपके चरणों तक आसानी से पहुंचा जा सकता है, लेकिन केवल उन लोगों द्वारा जो भौतिक रूप से थक चुके हैं। जो [भौतिक] प्रगति के पथ पर है, आदरणीय माता-पिता, महान संपन्नता, उच्च शिक्षा और शारीरिक सुंदरता से खुद को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है, वह ईमानदारी के साथ आपसे नहीं मिल सकता है।"
