श्रीमद् भागवतम (3.2.23) में श्री उद्धव विदुर से इस प्रकार कहते हैं:
अहो बकी यं स्तन-काल-कूट
जिघांसायपायद अपि असध्वी
लेभे गतिं धात्र्य-उचितं तत अन्यं
कं वा दयालुं शरणं व्रजेम
"हाय, मैं उससे अधिक दयालु किसका आश्रय लूंगा जिसने एक राक्षसी [पुतना] को माँ का पद प्रदान किया, यह होते हुए भी कि वह विश्वासघाती थी और उसने अपने स्तन से घातक जहर चूसने के लिए तैयार किया था?"
श्रीमद् भागवतम (10.48.26) में उद्धव भगवान कृष्ण से निम्नलिखित प्रार्थना करते हैं:
कह पंडितस त्वद अपरं शरणं समीयाद
भक्त-प्रियाद ऋत-गिरः सुहृदः कृत-ज्ञात
सर्वान ददाति सुहृदो भजतो अभिकामान
आत्मानम अपि उपचयापचयाउ न यस्य
"कौन विद्वान तुम्हारे अलावा किसी और का आश्रय लेगा, जब तुम अपने भक्तों के स्नेही, कृतज्ञ और सच्चे शुभचिंतक हो? जो लोग सच्ची मित्रता में तुम्हारी पूजा करते हैं, तुम उनकी हर इच्छा पूरी करते हो, यहाँ तक कि अपने आप को भी, फिर भी तुम कभी नहीं बढ़ते या घटते नहीं।"
चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.95 और 97) में कहा गया है:
भक्त-वत्सल, कृतज्ञ, समर्थ, वदान्य
हेन कृष्ण छाड़ि पंडित नाहि भजे अनय
विज्ञ-जनेर हय यदि कृष्ण-गुण-ज्ञान
अन्य त्याजि भजे, ताते उद्धव——प्रमाण
"भगवान कृष्ण अपने भक्तों के प्रति बहुत दयालु हैं। वे हमेशा बहुत आभारी और उदार होते हैं, और उनमें सभी क्षमताएं होती हैं। एक विद्वान व्यक्ति किसी और की पूजा करने के लिए कृष्ण को नहीं छोड़ता। जब भी एक अनुभवी व्यक्ति कृष्ण और उनके अलौकिक गुणों का वास्तविक ज्ञान विकसित करता है, तो वह स्वाभाविक रूप से अन्य सभी व्यस्तताओं को छोड़ देता है और भगवान की सेवा करता है। उद्धव इस बारे में प्रमाण देते हैं।"
