श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 158
 
 
श्लोक  2.1.158 
শাস্ত্রের না জানে মর্ম, অধ্যাপনা করে
গর্দভের প্রায যেন শাস্ত্র বহি’ মরে
शास्त्रेर ना जाने मर्म, अध्यापना करे
गर्दभेर प्राय येन शास्त्र वहि’ मरे
 
 
अनुवाद
"जो लोग शास्त्रों का तात्पर्य नहीं जानते, फिर भी उन्हें दूसरों को सिखाते हैं, वे शास्त्रों का बोझ ढोने वाले गधे के समान हैं।
 
"Those who do not know the meaning of the scriptures and yet teach them to others are like donkeys carrying the burden of the scriptures.
तात्पर्य
जो शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, वे दो प्रकार के होते हैं: एक समूह उनकी है, जो गायों या गधों की तरह शास्त्रों का बोझ उठाते हैं और दूसरा समूह उनके हैं, जो शहद की मधुमक्खियों की तरह शास्त्रों का सार निकालते हैं। तात्पर्य यह है कि, अपनी भौतिक इंद्रियों को संतुष्ट करने के लिए, असत्य-ज्ञान से प्रेरित, गधे जैसे अध्यापक, जो शास्त्रों के वास्तविक अर्थ से अनजान होते हैं, यह नहीं समझाते कि जीवन का लक्ष्य transcendental ज्ञान की देवी सरस्वती के पति, भगवान कृष्ण की अखंड सेवा है। जिस प्रकार गाय और गधे एक जार में रखी शहद या चीनी की मिठास का आनंद नहीं उठा सकते, उसी प्रकार वेदों का अध्ययन और शिक्षण, ऐसे गधे जैसे, अभिमानी, तथाकथित विद्वान विद्वानों द्वारा जो व्यर्थ में मूर्ख जानवरों की तरह कड़ा परिश्रम करते हैं, पूरी तरह से निरर्थक और अर्थहीन है। माया से भ्रमित होकर, वे मूर्ख व्यक्ति फिर गलती से अन्य समान रूप से योग्य गधे जैसे लोगों को विद्वान के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। पर वास्तव में बुद्धिमान हंस जैसे भक्तों के लिए जो बंधन और मुक्ति के कारणों को जानते हैं, उन्हें विद्वान विद्वानों के रूप में संबोधित करना सर्वोत्तम और उचित है। श्रीमद् भागवतम (4.29.44) में नारद मुनि संत राजा प्राचीनबर्हि से इस प्रकार कहते हैं:

adyāpi vācas-patayas

tapo-vidyā-samādhibhiḥ

paśyanto 'pi na paśyanti

paśyantaṁ parameśvaram

"हालांकि विशेषज्ञ वक्ताओं ने लगातार तपस्या, ज्ञान और समाधि के बल पर विचार-विमर्श किया, वे भगवान को पूरी तरह से नहीं जान सके, जो सभी चीजों के साक्षी हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)