छान्दोग्य उपनिषद (6.14.2) में कहा गया है: आचार्यवान पुरुषो वेदा- "जो आचार्यों के शिष्य-परंपरा का अनुसरण करता है वह चीजों को वैसा ही जानता है जैसा वे हैं।"
श्वेताश्वतर उपनिषद (6.23) में कहा गया है:
यस्य देवे परा भक्ति यथा देवे तथा गुरु
तस्यैते कथिता ह्यार्थाः प्रकाशांते महात्मनः
"केवल उन महान आत्माओं को जो भगवान और आध्यात्मिक गुरु दोनों में परम आस्था रखते हैं, वैदिक ज्ञान के सभी आयात स्वतः ही प्रकट हो जाते हैं।"
कठोपनिषद (1.2.23) में कहा गया है:
नायं आत्मा प्रवचनेन लभ्यो
ना मेधया ना बहुना श्रतेन
यम एवैष वृणुते तेन लभ्यस
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वां
"परम भगवान विशेषज्ञ स्पष्टीकरण, विशाल बुद्धि, या अधिक सुनने से प्राप्त नहीं होते हैं। वह केवल उसी के द्वारा प्राप्त होता है जिसे वह स्वयं चुनता है। ऐसे व्यक्ति को वह अपने रूप को प्रकट करता है।"
श्रीमद् भागवतम (11.11.18) में कहा गया है:
शब्द-ब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायत परे यदि
श्रमस तस्य श्रम-फलो ह्यधेनुम इव रक्षतः
"यदि कोई वैदिक साहित्य में विद्वान है, लेकिन भगवान विष्णु का भक्त नहीं है, तो उसका कार्य श्रम का एक व्यर्थ अपव्यय है, जैसे उस गाय का पालन करना जो दूध नहीं देती है।"
श्रीमद्भागवत (10.14.29) आगे बताता है:
अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय-
प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि
जानति तत्त्वं भगवान्-महिम्नो
न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वान
"हे प्रभु, यदि किसी को आपके चरण कमलों की कृपा का एक छोटा सा अंश भी प्राप्त हो जाए, तो वह आपके व्यक्तित्व की महानता को समझ सकता है। लेकिन जो लोग भगवान को समझने का अनुमान लगाते हैं, वे आपको नहीं जान पाते, भले ही वे कई वर्षों तक वेदों का अध्ययन करते रहें।"
