श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  2.1.157 
কৃষ্ণের ভজন ছাডি’ যে শাস্ত্র বাখানে
সে অধম কভু শাস্ত্র-মর্ম নাহি জানে
कृष्णेर भजन छाडि’ ये शास्त्र वाखाने
से अधम कभु शास्त्र-मर्म नाहि जाने
 
 
अनुवाद
“जो कोई भी कृष्ण की पूजा का उल्लेख किए बिना शास्त्रों की व्याख्या करता है, वह पतित आत्मा है जो शास्त्रों का तात्पर्य नहीं जानता।
 
“Anyone who interprets the scriptures without mentioning the worship of Krishna is a fallen soul who does not know the meaning of the scriptures.
तात्पर्य
जो लोग पिछले जन्मों में ढेर सारे अधर्मी कार्य कर चुके हैं और इस प्रकार कृष्ण की पूजा छोड़ देते हैं, जो सभी शास्त्रों का एकमात्र आशय है, और भक्ति भावना पर आधारित शास्त्रों की व्याख्या नहीं करते हैं - दूसरे शब्दों में, जो लोग किसी भी प्रकार की धार्मिक प्रक्रियाओं को स्वीकार करते हैं, अन्याभिलाषा, कर्म, ज्ञान और योग को जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रक्रियाओं के रूप में और धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जीवन के लक्ष्यों के रूप में स्वीकार करते हैं - ऐसे लोग वास्तव में शास्त्रों के वास्तविक आशय या उद्देश्य को नहीं जानते हैं। श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणों से निम्नलिखित छंदों पर विचार करना चाहिए।

छान्दोग्य उपनिषद (6.14.2) में कहा गया है: आचार्यवान पुरुषो वेदा- "जो आचार्यों के शिष्य-परंपरा का अनुसरण करता है वह चीजों को वैसा ही जानता है जैसा वे हैं।"

श्वेताश्वतर उपनिषद (6.23) में कहा गया है:

यस्य देवे परा भक्ति यथा देवे तथा गुरु

तस्यैते कथिता ह्यार्थाः प्रकाशांते महात्मनः

"केवल उन महान आत्माओं को जो भगवान और आध्यात्मिक गुरु दोनों में परम आस्था रखते हैं, वैदिक ज्ञान के सभी आयात स्वतः ही प्रकट हो जाते हैं।"

कठोपनिषद (1.2.23) में कहा गया है:

नायं आत्मा प्रवचनेन लभ्यो

ना मेधया ना बहुना श्रतेन

यम एवैष वृणुते तेन लभ्यस

तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वां

"परम भगवान विशेषज्ञ स्पष्टीकरण, विशाल बुद्धि, या अधिक सुनने से प्राप्त नहीं होते हैं। वह केवल उसी के द्वारा प्राप्त होता है जिसे वह स्वयं चुनता है। ऐसे व्यक्ति को वह अपने रूप को प्रकट करता है।"

श्रीमद् भागवतम (11.11.18) में कहा गया है:

शब्द-ब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायत परे यदि

श्रमस तस्य श्रम-फलो ह्यधेनुम इव रक्षतः

"यदि कोई वैदिक साहित्य में विद्वान है, लेकिन भगवान विष्णु का भक्त नहीं है, तो उसका कार्य श्रम का एक व्यर्थ अपव्यय है, जैसे उस गाय का पालन करना जो दूध नहीं देती है।"

श्रीमद्भागवत (10.14.29) आगे बताता है:

अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय-

प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि

जानति तत्त्वं भगवान्-महिम्नो

न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वान

"हे प्रभु, यदि किसी को आपके चरण कमलों की कृपा का एक छोटा सा अंश भी प्राप्त हो जाए, तो वह आपके व्यक्तित्व की महानता को समझ सकता है। लेकिन जो लोग भगवान को समझने का अनुमान लगाते हैं, वे आपको नहीं जान पाते, भले ही वे कई वर्षों तक वेदों का अध्ययन करते रहें।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)