श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  2.1.150 
কৃষ্ণের চরণ ছাডি’ যে আর বাখানে
বৃথা জন্ম যায তার অসত্য-বচনে
कृष्णेर चरण छाडि’ ये आर वाखाने
वृथा जन्म याय तार असत्य-वचने
 
 
अनुवाद
“जो व्यक्ति कृष्ण के चरणकमलों को त्याग देता है और वस्तुओं को उनसे पृथक बताता है, उसका जीवन उसके मिथ्या कथनों के कारण व्यर्थ है।
 
“The person who abandons the lotus feet of Krishna and considers things separate from Him, his life is wasted because of his false statements.
तात्पर्य
कृष्ण ही सभी कारणों का कारण और सभी का मूल स्रोत हैं। अहंकारी, गधे जैसे, अज्ञानी लोग जो उनके चरण-कमलों की सेवा त्याग देते हैं और अज्ञान-रूपी परम्परा की शरण लेते हैं, वे शास्त्रों के अर्थ को ऊपरी व्याख्याओं द्वारा तोड़-मरोड़ देते हैं। इस प्रकार वे अपने दुर्लभ रूप से प्राप्त मानव जीवन को व्यर्थ कर देते हैं। दूसरे शब्दों में, जैसा कि श्रीमद भागवतम में कहा गया है, वे वास्तव में जीवित-मृत (जीते हुए मुर्दे), जीवां-चेवा (मृत शरीर), या श्वसन-शव (सांस लेते हुए भी मृत) हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)