कृष्ण में पूर्णतया लीन होकर भगवान ने सभी सूत्रों, सूत्रों और टीकाओं में हरि के नामों की व्याख्या की।
Being completely absorbed in Krishna, the Lord explained the names of Hari in all the sutras, sutras and commentaries.
तात्पर्य
एक शिक्षक के रूप में, कृष्ण प्रेम में पूर्णतः लीन, निमाई ने सिखाने के दौरान यह समझाया कि हरि का नाम सभी सूत्रों, सूत्र-वचनों और टीकाओं का एकमात्र उद्देश्य था। हर शब्द का पारंपरिक अर्थ तीन दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है - विद्वद्रूढ़ि, प्रबुद्ध व्यक्तियों के अनुसार परंपरागत अर्थ, साधारण-रूढ़ि, साधारण व्यक्तियों के अनुसार परंपरागत अर्थ और अज्ञ-रूढ़ि, प्रबुद्ध व्यक्तियों के अनुसार पारंपरिक अर्थ। उस समय, अज्ञ-रूढ़ि से प्रेरित होकर, व्याकरण के सांसारिक शिक्षक जो इंद्रिय सुख से जुड़े हुए थे, उन्होंने हर शब्द को इंद्रिय सुख के लिए अनुकूल बताया। उनकी आनंद लेने की प्रवृत्ति के कारण, वे यह नहीं समझ पाए कि हर शब्दांश और शब्द कृष्ण चेतना को उत्तेजित करते हैं और इसलिए परम सत्य से भिन्न नहीं हैं। गौरसुंदर ने अपने छात्रों को समझाया कि विद्वद्रूढ़ि के माध्यम से चर्चा और अध्ययन करके कोई पुस्तक का वास्तविक अर्थ प्राप्त कर सकता है। उन्होंने आगे बताया कि यह मानना पूरी तरह से निषिद्ध है कि भगवान विष्णु और उनके दिव्य पवित्र नाम में कोई अंतर है। जब भी कोई भगवान और उनके नाम के बीच भेद देखता है तो यह समझना चाहिए कि वह अज्ञान-रूढ़ि से मजबूर है और भगवान की मायावी ऊर्जा से विचलित है। उस समय, विशंभर के पास आध्यात्मिक आकाश में स्थित दिव्य पवित्र नामों के संकेत के अलावा शब्दों के अर्थों का कोई बोध नहीं था। पवित्र, दिव्य विद्वद्रूढ़ि से, कृष्ण की सेवा के आध्यात्मिक आकाश में प्रकट होने वाली हर ध्वनि भगवान और उनके पवित्र नामों से पूरी तरह से अलग नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥