श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 141
 
 
श्लोक  2.1.141 
ভিন্ন লোক দেখিলে করেন সম্বরণ
ঊষঃ-কালে গঙ্গা-স্নানে করযে গমন
भिन्न लोक देखिले करेन सम्बरण
ऊषः-काले गङ्गा-स्नाने करये गमन
 
 
अनुवाद
भगवान् जैसे ही किसी भौतिकवादी व्यक्ति को देखते, अपनी आंतरिक भावनाएँ छिपा लेते। प्रतिदिन प्रातःकाल वे गंगा स्नान करने जाते।
 
Whenever the Lord saw a materialistic person, he would conceal his inner feelings. Every morning he would go to bathe in the Ganges.
तात्पर्य
जब कभी भगवान् अज्ञानी भौतिकवादी अभक्तों को देखते हैं जिनमें कृष्ण की सेवा की प्रवृति नहीं होती है, तो वे उन्हें सांसारिक मानते हैं और इसलिए वे कृष्ण से पृथक्करण की तीव्र भावनाओं से उत्पन्न अपने अत्यधिक प्रेम के परिवर्तनों को नियंत्रित और छुपा लेते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)