श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  2.1.137 
লক্ষ্মীরে আনিঞা পুত্র-সমীপে বসায
দৃষ্টিপাত করিযা ও প্রভু নাহি চায
लक्ष्मीरे आनिञा पुत्र-समीपे वसाय
दृष्टिपात करिया ओ प्रभु नाहि चाय
 
 
अनुवाद
माता शची ने जानबूझकर विष्णुप्रिया को अपने पुत्र के सामने बिठाया। यद्यपि भगवान ने उनकी ओर देखा, परन्तु वास्तव में उन्हें देखा नहीं।
 
Mother Shachi deliberately placed Vishnupriya in front of her son. Although the Lord glanced at her, he did not actually see her.
तात्पर्य
इस श्लोक [और श्लोक 19] में लक्ष्मी शब्द से विष्णुप्रिया-देवी का बोध होता है। शची ने देखा कि निमाई कृष्ण से इतर सभी विषयों के प्रति उदासीन हैं। सांसारिक माताओं के समान उनकी भी इच्छा थी कि उनके पुत्र में पारिवारिक मोह बढ़े। उन्होंने सोचा, 'यदि मैं अपने पुत्र को पुत्रवधू श्री विष्णुप्रिया-देवी के साथ अंतरंग बातचीत का अवसर दूँगी तो शायद कृष्ण की आराधना से जुड़ी मेर पुत्र की तीव्र प्रवृत्ति और आसक्ति जो भौतिक सुखों के बिलकुल विपरीत है, कम हो जाएगी।' सांसारिक विचारों के चलते बद्ध जीव युवावस्था में अपनी स्त्रियों को भोग की वस्तु मानकर भोगने का प्रयास करते हैं। इस तरह वे भौतिक अस्तित्व और गृहस्थ जीवन से आसक्त हो जाते हैं। किंतु प्रभु के मन में कभी ऐसे विचार नहीं उठे। हालाँकि, वे उदासीन थे, और कृष्ण-विरह से पीड़ित भी, फिर भी उन्होंने विष्णुप्रिया को सहानुभूतिपूर्ण ढंग से देखा, किंतु वे दास्य की मूर्ति विष्णुप्रिया-देवी को भोग की वस्तु मानकर उत्साहित नहीं हुए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)