श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  2.1.133 
পূর্ব-বিদ্যা-ঔদ্ধত্য না দেখে কোন জন
পরম বিরক্ত-প্রায থাকে সর্ব-ক্ষণ
पूर्व-विद्या-औद्धत्य ना देखे कोन जन
परम विरक्त-प्राय थाके सर्व-क्षण
 
 
अनुवाद
उन्होंने भगवान में वह अहंकार नहीं पाया जो उन्होंने पहले प्रदर्शित किया था, बल्कि उन्होंने उन्हें सदैव त्यागमय भाव में पाया।
 
He did not find in the Lord the ego that he had displayed earlier, but rather he found him always in a spirit of renunciation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)